– राकेश अचल
राजनीति में स्थाई दोस्ती नहीं होती, लेकिन स्थायी महत्वाकांक्षा जरूर होती है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अचानक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इतने बड़े मुरीद कैसे हो गए कि उन्होंने ‘अपनापन’ नाम की पूरी किताब ही लिख डाली? क्या ये सिर्फ श्रद्धा है? या सत्ता के गलियारों में दोबारा प्रवेश पाने की बेचैनी?
जब शिवराज थे आडवाणी खेमे के नेता
2014 का दौर याद कीजिए। भाजपा में प्रधानमंत्री पद को लेकर भीषण खींचतान थी। एक तरफ थे पार्टी के लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी और दूसरी तरफ तेजी से उभरते नेता नरेन्द्र मोदी। उस समय शिवराज सिंह चौहान मप्र के लोकप्रिय मुख्यमंत्री थे और माना जाता था कि वे आडवाणी खेमे के अधिक निकट थे। दिल्ली की राजनीति में उन्हें संघ के सौम्य चेहरे के रूप में देखा जाता था। लेकिन राजनीति में समय सबसे बड़ा निर्णायक होता है। मोदी लहर चली, मोदी प्रधानमंत्री बने और भाजपा का पूरा सत्ता संतुलन बदल गया।
मोदी ने हटाया नहीं, लेकिन अपनाया भी नहीं
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कई पुराने चेहरे हाशिए पर चले गए। शिवराज बचे रहे। उन्हें हटाया नहीं गया। वे मुख्यमंत्री बने रहे। लेकिन दिल्ली के सत्ता केन्द्र में उनकी पकड़ कभी मजबूत नहीं हुई। फिर आया 2018 का मप्र विधानसभा चुनाव। 15 साल सत्ता में रहने के बाद भाजपा हार गई। कांग्रेस सत्ता में आई और मुख्यमंत्री बने। हालांकि कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
सिंधिया ऑपरेशन और सत्ता वापसी
2020 में भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित राजनीतिक घटनाक्रम। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी… विधायक टूटे… और कमलनाथ सरकार गिर गई… और भाजपा फिर सत्ता में लौट आई। शिवराज फिर मुख्यमंत्री बने। कहा जाता है कि इस वापसी के बावजूद वे दिल्ली दरबार का पूरा भरोसा नहीं जीत पाए। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने भारी जीत दर्ज की, लेकिन मुख्यमंत्री नहीं बने शिवराज। दिल्ली ने चुना एक नया चेहरा। यहीं से शुरू होती है अपनापन की असली कहानी।
संसद में मोदी चालीसा से किताब तक
मुख्यमंत्री की कुर्सी हाथ से निकलने के बाद शिवराज को केन्द्र में कृषि मंत्री बना दिया गया। लेकिन भाजपा की किचिन कैबिनेट में उनकी जगह अब भी नहीं दिखती। इसी बीच संसद में शिवराज के भाषण चर्चा में आए। वे लगातार मोदी की प्रशंसा करते दिखाई दिए। विपक्ष ने इसे मोदी चालीसा कहा और अब उसी प्रशस्तिगान को किताब का रूप दे दिया गया- अपनापन, दिल्ली में भव्य लोकार्पण, फाइव स्टार आयोजन, मोदी युग की प्रशंसा और संदेश साफ- मैं पूरी तरह आपके साथ हूं।
भाजपा में व्यक्तिपूजा का नया दौर?
कभी भाजपा को कैडर आधारित पार्टी कहा जाता था। जहां विचारधारा व्यक्ति से बड़ी मानी जाती थी। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। अब पार्टी के भीतर सबसे बड़ा राजनीतिक निवेश क्या है? मोदी के प्रति सार्वजनिक निष्ठा। इसीलिए आज भाजपा में अनेक नेता अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री की सार्वजनिक प्रशंसा को जरूरी मानते हैं। कोई कविता लिख रहा है, कोई भाषण दे रहा है और कोई किताब।
क्या ‘अपनापन’ से पिघलेंगे मोदी?
सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या यह किताब शिवराज की राजनीतिक पुनर्वापसी का पासपोर्ट बनेगी? क्या मोदी उन्हें फिर मप्र की राजनीति में बड़ी भूमिका देंगे? या फिर यह सिर्फ एक वफादार नेता की हाजिरी भर है? क्योंकि भाजपा की राजनीति में अंतिम निर्णय अब सिर्फ संगठन का नहीं, बल्कि नेतृत्व के भरोसे का होता है और भरोसा किताबों से बनता है या सत्ता की उपयोगिता से- यही असली प्रश्न है। राजनीति में ‘अपनापन’ शब्द बहुत सुंदर लगता है, लेकिन सत्ता में अपनापन नहीं, समीकरण चलते हैं। शिवराज सिंह चौहान की किताब श्रद्धा भी हो सकती है, रणनीति भी। अब देखना ये है कि मोदी इस किताब को सिर्फ पढ़ते हैं या शिवराज को फिर से अपना भी लेते हैं।


