– राकेश अचल
भले ही शाखामृग न मानते हों किंतु दुनिया मानती है कि सत्याग्रह महात्मा गांधी का एक ऐसा अहिंसक हथियार था जिसने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। लेकिन दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल गांधीजी के इस पवित्र हथियार का निजी स्वार्थ के लिए बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। शायद अरविन्द केजरीवाल ने सत्याग्रह को जाना ही नहीं है। दिल्ली के जिस राजघाट पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी चिरनिद्रा में सो रहे हैं, वहां अदालत के खिलाफ सत्याग्रह करने पहुंचे अरविन्द केजरीवाल जाने-अनजाने एक जघन्य अपराध कर रहे हैं। प्रशांत भूषण जैसे दरियादिल लोग भले ही अरविन्द केजरीवाल के तमाम अक्षम्य अपराधों की अनदेखी कर उनका समर्थन कर रहे हों, किंतु दुनियां का कोई गांधीवादी केजरीवाल का समर्थन नहीं कर सकता।
अरविन्द केजरीवाल को शिकायत दिल्ली उच्च न्यायालय की महिला जज जस्टिस स्वर्ण कांता से से है। वे कहते हैं कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से न्याय मिलने की मेरी उम्मीद टूट चुकी है। अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हुए गांधीजी के सिद्धांतों को मानते हुए और सत्याग्रह की भावना के साथ मैंने फैसला किया है कि मैं इस केस में उनके सामने पेश नहीं होऊंगा और कोई दलील भी नहीं रखूंगा। अरविन्द केजरीवाल का रवैया बता रहा है कि वे एक तो महिला विरोधी मानसिकता के व्यक्ति हैं और आईआरएस होते हुए भी ये नहीं जानते कि उनकी आपत्ति महात्मा गांधी नही बल्कि सर्वोच्च न्यायालय सुन सकता है। केजरीवाल को कायदे से राजघाट पर सत्याग्रह करने के बजाय सर्वोच्च न्यायलय में जस्टिस स्वर्णकांता को सुनवाई से हटाने का निवेदन करना चाहिए था।
एक दशक तक मुख्यमंत्री रह चुके अरविन्द केजरीवाल शायद नहीं जानते कि धरना, प्रदर्शन और सत्याग्रह के जरिए न न्यायपालिका का भयादोहन मुमकिन है और न ही अपने पक्ष में फैसला कराना। केजरीवाल लगातार रॉन्ग नंबर डायल कर रहे हैं। मुझे यकीन है कि जिस मुद्दे को लेकर अरविन्द सत्याग्रह कर रहे हैं उसे किसी गांधीवादी का समर्थन तो दूर अपनी पार्टी का भी समर्थन नहीं मिलेगा। हकीकत ये है कि अरविन्द केजरीवाल अब बेनकाब हो चुके हैं। वे व्यक्तिवादी सोच से पार्टी चला रहे हैं। उनके ऊपर जो भी आरोप लगे हैं वे भले ही राजनीतिक अदावत का परिणाम हों, किंतु वे तब तक निर्दोष नहीं कहे जाएंगे जब तक कि अदालत उन्हें निर्दोष घोषित न कर दे और अरविन्द अदालत से भागते नजर आ रहे हैं। अच्छा तो ये होता कि वे राज्यसभा के उस सभापति के खिलाफ सत्याग्रह करते, जिसने सरेआम उन 7 दलबदलू राज्यसभा सदस्यों को योग्य घोषित कर दल बदल को प्रोत्साहित किया है। लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि इस दलबदल की जड़ में उनका ही तानाशाही पूर्ण रवैया रहा है। वे आम आदमी पार्टी को मायावती, अखिलेश या ऐसे किसी नेता की तरह पार्टी चला रहे हैं।
भारतीय राजनीति में अरविन्द केजरीवाल का प्रवेश एक दुर्घटना है। वे एक जन आंदोलन की देन हैं। उन्होंने जन आंदोलन को राजनीतिक दल में बदलकर जो पाप किया है वो अक्षम्य है। उनके साथ जितने भी लोग जुड़े वे सत्ता की चकाचोंध में बेपटरी हो गए। कुछ मन मारकर घर बैठ गए। अब घर बैठने की बारी अरविन्द केजरीवाल की है। अरविन्द केजरीवाल के प्रति एक पत्रकार के नाते मेरी सहानुभूति तो रत्तीभर नहीं है। जिसकी हो, उसकी हो सकती है। अरविन्द ने यदि ईमानदारी से पार्टी चलाई होती तो अव्वल तो पार्टी टूटती-बिखरती नहीं। बिखरती भी तो आप के नेता भाजपा में शामिल नहीं होते। वे जनता के लिए लड़ने वाले किसी और दल के साथ जाते। लेकिन आपके तमाम चाकलेटी नेता भाजपा की गोद में बैठकर सत्ता का स्तनपान करने के लिए लालायित हैं। मैं तो महात्मा गांधी से यही कहूंगा कि वे अरविन्द केजरीवाल से अपना सत्याग्रह का हथियार छीन लें या उसे निष्क्रिय कर दें, ताकि सत्याग्रह की शुचिता अक्षुण रह सके।


