भिण्ड, 24 मार्च। महर्षि अरविन्द महाविद्यालय गोहद के प्रांगण में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एवं गजरथ महोत्सव का आयोजन भक्ति भाव के साथ किया जा रहा है। जिसमे प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु कार्यक्रम में पहुंच कर धर्म लाभ ले रहे हैं।
भगवान पार्श्वनाथ का केवल ज्ञान, कल्याणक (कैवल्य) ज्ञान और धैर्य की पराकाष्ठा है। दीक्षा के 84वें दिन वाराणसी के पास आश्रमपद उद्यान में ध्यान मग्न पार्श्वनाथ जी पर कमठ (पूर्व जन्म के शत्रु) ने भीषण उपसर्ग (कष्ट) किए, लेकिन वे विचलित नहीं हुए। धरणेन्द्र देव ने उनकी रक्षा की, और पार्श्वनाथ जी को केवल ज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त हुआ।
30 वर्ष की आयु में राजा अश्वसेन के पुत्र पार्श्व कुमार ने सांसारिक सुख त्यागकर दीक्षा ली। उन्होंने कठोर तप और ध्यान साधना शुरू की। वहीं कमठ, जो पार्श्वनाथ जी के पिछले जन्मों (मरुभूति और हाथी) का शत्रु था, ने उन पर भयानक पत्थर, बारिश और बिजली के हमले किए। लेकिन भगवान पार्श्वनाथ इन कष्टों के बीच भी अडिग होकर ध्यान में मग्न रहे, जिससे उनका कर्म बंधन टूट गया और उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। इस दौरान धरणेन्द्र देव ने भगवान के सिर पर फणों का छत्र बनाया और पद्मावती देवी ने उपसर्ग दूर किए।
केवल ज्ञान प्राप्त करने के बाद उन्होंने 70 वर्ष तक जैन धर्म का उपदेश दिया, चतुर्विध संघ की स्थापना की और अंत में 100 वर्ष की आयु में सम्मेद शिखर पर मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त किया। इन सभी क्रियाओं को मंत्रों के माध्यम से विद्वानों द्वारा पूर्ण किया गया। वहीं समवशरण की सुंदर रचना की गई। जहां केवल ज्ञान के बाद भगवान की वाणी खिरी। जिसे गणधरों द्वारा अलग-अलग जीवों को उनका वर्णन किया गया।
Sunday, April 5
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