भिण्ड, 23 मार्च। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का दीक्षा कल्याणक पौष कृष्ण एकादशी को वाराणसी में हुआ। 30 वर्ष की आयु में सांसारिक भोगों से विरक्त होकर उन्होंने नव लोकांतिक देवों की विनती पर वर्षिदान दिया और 300 अन्य राजाओं के साथ विशाला शिविका में बैठकर आश्रमपद उद्यान में अशोक वृक्ष के नीचे दिगंबर दीक्षा ग्रहण की।
पार्श्व कुमार जन्म से ही तीन ज्ञान के धनी थे और सांसारिक जीवन से निर्लिप्त रहते थे। दीक्षा से एक वर्ष पूर्व, लोकांतिक देवों ने प्रभु को धर्मतीर्थ के प्रवर्तन (दीक्षा) के लिए प्रेरित किया। इसके बाद भगवान ने एक वर्ष तक वर्षिदान (अथाह दान) दिया। प्रभु विशाला नामक शिविका (पालकी) में बैठकर आश्रमपद उद्यान (वाराणसी) पहुंचे। पंचमुष्टि लोच: उद्यान में अशोक वृक्ष के नीचे, प्रभु ने अपने आभूषणों और वस्त्रों का त्याग किया। उन्होंने अपने हाथों से अपने सिर के बाल उखाड़े, जिसे पंचमुष्टि लोच कहा जाता है। ज्ञान प्राप्ति: दीक्षा के साथ ही प्रभु को मन:पर्यय ज्ञान उत्पन्न हुआ। मौन साधना: दीक्षा लेने के पश्चात, प्रभु ने मौन धारण कर लिया और 300 अन्य राजाओं के साथ तपस्या में लीन हो गए। सभी क्रियाएं पंचकल्याणक महोत्सव में आयोजित की गई।
Tuesday, September 29
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