– राकेश अचल
पूरा देश इस समय गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मन्दिर में 8 से 11 जनवरी तक स्वाभिमान पर्व मना। यह पर्व सोमनाथ मन्दिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे होने की याद में आयोजित किया गया है। इस भव्य आयोजन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी शिरकत की है। 10 जनवरी की शाम पीएम मोदी ने मन्दिर में ओंकार मंत्र का जाप किया।
पर्व संस्कृत के पर्वन् शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- विशेष अवसर, मोड़ या जोड़। जैसे बांस की गांठ को भी पर्व कहते हैं- जहां एक चरण यह खत्म होता है और नया शुरू होता है। पर्व वह विशिष्ट दिन या काल होता है, जो धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक या ऐतिहासिक महत्व रखता है और जिसे लोग उत्सव, व्रत, पूजा, मेल-मिलाप के साथ मनाते हैं। जैसे- दीपावली, होली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व, पोंगल आदि।
हमारे पुरखे कहते थे कि पर्व प्रकृति और समय के बदलाव का सम्मान है। कई पर्व ऋतु परिवर्तन, फसल, चन्द्र-सौर गणना से जुड़े हैं। मकर संक्रांति सूर्य की दिशा से, तो बसंत पंचमी ऋतु परिवर्तन से। बैसाखी फसल सामूहिक स्मृति और परंपरा को बचाने के लिए पर्व हमें हमारी सभ्यता, इतिहास और विश्वास से जोड़ते हैं। सामाजिक एकता के लिए पर्व मनाने से लोग मिलते हैं। मतभेद भूलते हैं। समुदाय मजबूत होता है। पर्व मानसिक विश्राम और आनंद के लिए, दैनिक संघर्षों से विराम, खुशी, संगीत, रंग, भोजन के लिए भी मनाए जाते हैं। क्योंकि यह सब मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।
नैतिक और मानवीय मूल्यों की याद के लिए भी पर्व मनाने का प्रावधान है। अधिकतर पर्व किसी संदेश से जुड़े होते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत, त्याग, करुणा, प्रेम, साझेदारी आदि। सरल शब्दों में पर्व जीवन के ठहराव के क्षण हैं, जहां आदमी रुककर सोचता है। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं और किसके साथ हूं। भारत की सरकार जिस स्वाभिमान का पर्व मना रही है उसमें क्या सब शामिल हैं या ये स्वाभिमान एक जाति, समूह या पंथ का है? मुमकिन है कि ये सवाल चुभे किंतु सवाल तो सवाल है। इसका जबाब भी दूसरे सवालों की तरह कोई नहीं देगा। लेकिन जिस तरह से भाजपा पूरे देश के शिवालयों में पूजा, जाप के लिए उमड़ी उसे देखकर लगता है कि ये पर्व न सोमनाथ का है, न खजुराहो का, न महाकाल का। ये भाजपा के स्वाभिमान का पर्व है।
सरकार को यदि स्वाभिमान पर्व मनाना ही था तो किसी एक मन्दिर का नहीं, बल्कि भारत के स्वाभिमान का पर्व मनाना था। जिसे इन दिनों दुनियां लगातार नुकसान पहुंचा रही है। भारत के स्वाभिमान को छोटे-छोटे पड़ौसी देशों से लेकर बड़ी-बड़ी वैश्विक शक्तियां आहत कर रही हैं। आजादी के बाद पिछले दशक में भारत के स्वाभिमान की जो बेकदरी हुई उसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।
भारत के स्वाभिमान को क्षति पहुंचाकर तीन हजार ड्रोंस का भव्य ड्रोन शो देखना एक तरह की बेशर्मी है। क्योंकि कोई भी ड्रोन शो सोमनाथ मन्दिर परिसर को भव्यता और दिव्यता से नहीं भर सकता। हां ड्रोन शो हमारी प्राचीन आस्था के साथ आधुनिक टेक्नोलॉजी का तालमेल किसी भी अशांत मन को मंत्रमुग्ध कर सकता है। लेकिन ड्रोन शो के जरिये पूरे विश्व को भारत की सांस्कृतिक शक्ति का संदेश नहीं दिया जा सकता।
आपको बता दूं कि ड्रोन शो में ड्रोंस की मदद से कई सुंदर छवियों को आसमान में उतारा गया। ड्रोन से आसमान में भगवान शिव के त्रिशूल और डमरू की तस्वीर बनाई गई। सोमनाथ मन्दिर, शिवलिंग और ब्रह्माण्ड की आकृति भी ड्रोन की मदद से आसमान में दिखाई गई। स्वाभिमान पर्व पर प्रधानमंत्री मोदी ने सोमनाथ मन्दिर में ओंकार मंत्र का जाप किया। मोदी जी की धार्मिक आस्था, समर्पण प्रणम्य है। लेकिन वे इसे पूरे देश पर लादने का प्रयास कर रहे हैं। वे राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा करना चाहते हैं तो पूरा देश उनके साथ खड़ा हो सकता है, किंतु उनके देश में सिर्फ हिन्दू हैं, सिर्फ भाजपा है, बांकी सब फिरंगी हैं, विलायती हैं, घुसपैठिये हैं, भाजपा को छोड़ कोई दूसरा राजनीतिक दल राष्ट्रभक्त है ही नहीं, सबके सब देशद्रोही हैं। ऐसे में भाजपा का सरकारी खर्च पर मनाए जाने वाला स्वाभिमान पर्व भाजपा को, मोदी जी को मुबारक हो। देश के स्वाभिमान की रक्षा देश की जनता स्वयं कर लेगी।


