– राकेश अचल
दुनिया में बहुत से देश ऐसे होते हैं जो अपने अतीत से जुड़ी हर चीज को हर कीमत पर महफूज रखना चाहते हैं। ठीक इसके विपरीत बहुत से ऐसे देश हैं जहां सरकारें अपनी विरासत को जीम जाना चाहती हैं। दिल्ली का जिमखाना भी भारत की ऐक ऐसी विरासत है जो 5 जून के बाद अपनी पहचान ही नहीं बल्कि वजूद भी खो देगी। केन्द्र सरकार ने क्लब से 5 जून तक अपनी जमीन और कैम्पस खाली करने को कहा है, सरकार के मुताबिक ये जमीन करीब 27.3 एकड़ है।
सूत्रों के मुताबिक क्लब को 22 मई को आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के तहत आने वाले लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस से नोटिस मिला है। क्लब ने अपने सदस्यों को भेजे आधिकारिक संदेश में कहा कि केन्द्र सरकार ने लुटियंस दिल्ली में स्थित उसके कैम्पस को डिफेंस स्ट्रक्चर को मजबूत और सुरक्षित करने और पब्लिक सेफ्टी के लिए खाली करने को कहा है।
दरअसल जिमखाना की यह जमीन दिल्ली के 2 सफदरजंग रोड पर स्थित है, जो लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास के पास है। यह जमीन मूल रूप से तत्कालीन इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब लिमिटेड को सामाजिक और खेल क्लब चलाने के लिए लीज पर दी गई थी। अब भारत की राष्ट्रपति ने लीज डीड के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए लीज समाप्त करने और परिसर को तत्काल वापस लेने का आदेश दिया है। री-एंट्री के बाद पूरी जमीन, भवन, ढांचे, लॉन और फिटिंग्स सरकार के अधिकार में चली जाएंगे। 5 जून को इसका कब्जा लेने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
इस बीच सरकार की ओर से जिमखाना क्लब की जमीन और कैम्पस खाली करने के नोटिस की काफी चर्चा हो रही है। मैं कभी जिमखाना नहीं गया। जा भी नहीं सकता था, क्योंकि मेरी हैसियत नहीं है, लेकिन मेरे मिलने वाले तमाम बाहैसियत लोग जिमखाना के सदस्य भी हैं और यूं भी आते-जाते रहे हैं। मेरे जैसा कूढ़ मगज तो शुरू में जिमखाना को एक फिटनेस सेंटर यानि जिम ही समझता था।
हमारी बिरादरी के शीर्ष पत्रकार शेखर गुप्ता कहते हैं कि यह वाकई बड़ी दुस्साहसिक कार्रवाई है। मोदी सरकार अब भारत के असली और स्थाई सत्ता प्रतिष्ठान को चुनौती दे रही है। क्रेन वेदी के नाम से विख्यात रहीं पूर्व आईपीएस अफसर और पुंडुचेरी की पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर किरन बेदी को भी जिमखाना जीमने की सरकारी जिद दुर्भाग्यपूर्ण लगती है। वे कहती हैं कि ये सचमुच बेहद दुखद। उम्मीद है कि इस प्रस्ताव पर फिर से विचार किया जाएगा। आप मानें या न मानें, लेकिन मानने वाले मानते हैं कि दिल्ली जिमखाना क्लब सिर्फ एक संपत्ति भर नहीं है, यह हमारी संस्थागत और खेल विरासत का हिस्सा है। बदलाव जरूरी हो सकता है, लेकिन इतिहास और विरासत को सोच-समझकर सहेजने की जरूरत है। क्लब के कई सदस्यों और अन्य लोगों ने सरकार की इस कदम की आलोचना की है। लेकिन क्लब के सदस्य जिमखाना बचाने के लिए न आंदोलन कर सकते हैं और न सरकार से लड़ सकते हैं, उनके आंसू घड़ियाली हैं।
भारत में क्लब संस्कृति की शुरुआत अंग्रेजों के शासनकाल में हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर, सैनिक और व्यापारी अपने सामाजिक मेल-जोल, खेल, शराब खाने और मनोरंजन के लिए 18वीं-19वीं सदी में क्लब बनाने लगे। शुरुआत में ये क्लब लगभग पूरी तरह अंग्रेजों के लिए थे, भारतीयों को प्रवेश नहीं मिलता था। बाद में धीरे-धीरे रियासतों के राजा-महाराजा और भारतीय अभिजात वर्ग भी इन क्लबों से जुड़ने लगे। भारत के सबसे पुराने क्लबों में से एक और आमतौर पर सबसे पुराना मद्रास क्लब है, इसकी स्थापना 1832 में हुई थी। दिल्ली का जिमखाना क्लब भी भारत के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित क्लबों में से एक है। यह 3 जुलाई 1913 को अस्तित्व में आया। शुरू में जिमखाना क्लब इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से जाना जाता था और स्पेंसर हार्कोर्ट बटलर इसके पहले अध्यक्ष थे।
मप्र के ग्वालियर शहर में जिमखाना से भी पुराना जीवाजी क्लब है। परिष्कार, संस्कृति और सौहार्द के रूप में परिकल्पित जीवाजी क्लब ग्वालियर की शाही विरासत का एक जीवंत प्रमाण है। इसकी स्थापना 4 जुलाई 1898 को हुई थी, जब ब्रिटिश रीजेंट महाराजा माधव राव सिंधिया के शासनकाल के दौरान इस क्लब का असली नाम एल्गिन क्लब था।
बहरहाल बात जिमखाना क्लब की है। आजादी के बाद इसके नाम से इम्पीरियल शब्द हटा दिया गया और तब से इसे सिर्फ दिल्ली जिमखाना क्लब कहा जाने लगा। करीब 1200 सदस्यों वाले इस क्लब में एंट्री मुश्किल है। यहां सदस्य बनने के लिए 20-30 साल तक की प्रतीक्षा सूची है। पिछले 113 सालों से यह क्लब हाई-सोसाइटी के इलीट्स की गतिविधियों का केन्द्र रहा है। क्लब में 26 ग्रास टेनिस कोर्ट हैं। इसके अलावा स्क्वैश कोर्ट, बैडमिंटन कोर्ट, बिलियर्ड्स रूम, स्विमिंग पूल, तीन लाउंज बार और 43 कॉटेज भी हैं। अब चूंकि जिमखाना क्लब की अत्यंत कीमती जमीन पर सरकार की नजर लग गई है तो शायद ही कोई इसे बचा पाए। जिमखाना भी 5 जून 2026 के बाद जमीदोज कर दिया जाएगा। इसका इतिहास भी तीन मूर्ति भवन की तरह हमेशा के लिए दफना दिया जाएगा।


