– राकेश अचल
कांग्रेस : एक समय देश की सबसे ताकतवर पार्टी आज सवालों के घेरे में है। नेता जा रहे हैं, नाराजगी बढ़ रही है और पार्टी टूट रही है, बिखर रही है, सिमट रही है। क्या ये अंत की शुरुआत है? असम से कांग्रेस के पूर्व सांसद प्रद्युत बोरदोलोई का भाजपा में जाना कोई साधारण घटना नहीं है। ये एक ट्रेंड है- जहां नेता पार्टी से ज्यादा खुद को बड़ा मानने लगे हैं।
कांग्रेस की सबसे बड़ी बीमारी
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या विचारधारा नहीं, नेतृत्व और महत्वाकांक्षा का टकराव है। हर राज्य में छोटे-छोटे हाईकमान बैठे हैं, जो सब कुछ चाहते हैं और जब नहीं मिलता तो वही नेता बिभीषण बन जाते हैं।
मध्य प्रदेश का उदाहरण
मप्र में भी हालात अलग नहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिर्फ के बेटे अजय सिंह उर्फ राहुल भैया ये सभी नेतृत्व से पूरी तरह संतुष्ट नहीं माने जाते। इन्हें हाल ही में मप्र कांग्रेस कमेटी की दिल्ली में आयोजित बैठक में नहीं बुलाया गया तो तीनों के मुंह लटक गए। खबर तो ये भी है कि अजय सिंह तो भाजपा में जाने का मन भी बना रहे हैं। यानी संकट सिर्फ एक राज्य का नहीं, पूरी पार्टी का है।
11 साल में टूट की घटनाएं
पिछले 11 साल में कांग्रेस को लगातार झटके लगे। एक जानकारी के मुताबिक 2014 से 399 कांग्रेस नेताओं ने दलबदल किया, जिनमें 11 पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हैं। इनमें से अधिकांश भाजपा में शामिल हुए हैं। एडीआर यानि एशोसिऐशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म की 2021 रिपोर्ट कहती है 2014 से 2021 के बीच कांग्रेस से सबसे ज्यादा दलबदल हुए।
भाजपा सबसे बड़ी लाभार्थी रही
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 110 ऐसे उम्मीदवार उतारे जो 2014 के बाद पार्टी में शामिल हुए थे, जिनमें से कम से कम 38 पूर्व कांग्रेस से थे। हाल के बड़े बैच जैसे राजस्थान में 2024 में 25 से अधिक दिग्गज नेता एक साथ शामिल हुए, गुजरात में 800 कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस छोड़ी। पिछले एक दशक में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए वरिष्ठ नेताओं में हिमंता बिस्वा शर्मा (2015 असम के मुख्यमंत्री बन गए)। ज्योतिरादित्य सिंधिया (2020) केन्द्र में मंत्री बन गए। जितिन प्रसाद (2021), अशोक चव्हाण (2024 पूर्व मुख्यमंत्री महाराष्ट्र), अमरिंदर सिंह (पूर्व मुख्यमंत्री पंजाब), नारायण राणे (2019 पूर्व मुख्यमंत्री), किरण रेड्डी (2023 पूर्व मुख्यमंत्री आंध्र), सुनील जाखड़ (2022), हार्दिक पटेल (2022), अनिल एंटनी (2023) और कई अन्य जैसे राधाकृष्ण विखे पाटिल, शंकर सिंह वाघेला के नाम आपको याद होंगे ही।
कांग्रेस छोडृने का यह ट्रेंड 2014 के बाद से मजबूत हुआ है, खासकर चुनावों से पहले। 2014 के बाद बड़े नेताओं का पलायन हुआ। कई राज्यों में पूरी यूनिट का टूटनाये सिर्फ घटनाएं नहीं, कांग्रेस की गिरती पकड़ का संकेत हैं। शशि थरूर जैसे नेता लगातार कांग्रेस की नीति रीति के खिलाफ काम कर रहे हैं।
राहुल गांधी की भूमिका
राहुल गांधी की सबसे बड़ी ताकत क्या है? वे झुकते नहीं। समझौता नहीं करते। लेकिन यही उनकी कमजोरी भी बन रही है। क्योंकि कांग्रेस के पुराने दिग्गज राहुल कठपुतली बनना नहीं चाहते और राहुल पुराने नेताओं की। सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब विपक्ष ही कमजोर हो तो सत्ता कितनी मजबूत हो जाती है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज पहले से ज्यादा मजबूत दिखते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस की कमजोरी मोदी को और अजेय बना देगी?
खामनेई से तुलना
कुछ लोग प्रधानमंत्री मोदी की तुलना अयातुल्ला खोमनेई से करने से भी परहेज नहीं करते। बल्कि तुलना करते हैं जो ईरान में लंबे समय तक अटूट शक्ति का केन्द्र बना रहता है। भारत में ऐसा होगा या नहीं कहना कठिन है। क्योंकि भारत एक लोकतंत्र है। यहां मतदाता तय करेगा। अब कांग्रेस टूट रही है या खुद को नए रूप में गढ़ रही है, ये वक्त बताएगा। लेकिन एक बात तय है कि कमजोर विपक्ष मजबूत सत्ता को जन्म देता है और यही भारत की राजनीति का सबसे बड़ा सच है।


