– राकेश अचल
गिलोटिन संसदीय उपकरण है और फांसीवादी उपकरण भी। मेरे लिए ये लगभग नया सा शब्द है। आभार मानता हूं भारत के संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू का, जो उन्होंने मुझे इस शब्द से वाकिफ करा दिया। गिलोटिन को लेकर विपक्षी सांसद सतर्क हों या न हों, लेकिन मैं सतर्क हो गया हूं।
गिलोटिन से मुझे कभी भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र की अनुभूति होती है तो कभी भगवान परशुराम के फरसे की। गिलोटिन को आप कुठार, गडासा या दराती भी कह सकते हैं। गिलोटिन और उसके सभी पर्यायवाची उपकरणों का एक ही काम है और वो है गर्दन तराशना। सिर कलम करना। गिलोटिन का इस्तेमाल कर सरकार बहस से बच जाती है। परोक्ष रूप से सरकार गिलोटिन के जरिए विपक्ष की जिव्हा काटती है। सरकार शुरू से बहसों से बचती है। सदन के भीतर और बाहर भी। अब सुना है कि पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा फोर स्टार डेस्टिनी विवाद के बाद अब लेखन कार्य करने वाले सेवानिवृत अधिकारियों के खिलाफ भी गिलोटिन का इस्तेमाल करना चाहती है। जब चाहती है तो इस्तेमाल कर भी सकती है।
छन-छनकर बाहर आने वाली खबरें बताती हैं कि सरकार सेवानिवृत अधिकारियों पर लागू कूलिंग काल 3 साल से घटाकर 20 साल करने पर विचार कर रही है। मतलब अगर कोई अधिकारी सेवानिवृत होने के बाद कुछ लिखना भी चाहे तो लिख ही न पाए। जब लिखने की आजादी मिलेगी तब तक उम्र 80 की हो जाएगी। बीस साल में सरकारें भी चार बार बदल जाएंगी। सरकार गिलोटिन प्रेमी है। गला और जनता की जेबें तराशने में सरकार को मजा आता है। यानि कतर-ब्योंत करना सरकार का सरकारी चरित्र है। मतलब गिलोटिन का बार-बार इस्तेमाल करने वाली सरकार को आप अहिंसक या गांधीवादी सरकार नहीं कह सकते। अहिंसक सरकार बहस से नहीं भागती। विपक्ष को दुश्मन नहीं बल्कि अपना दोस्त समझती हैं। देश में बहुत दिनों से कोई दोस्त सरकार बनी नहीं न!
गिलोटिन भाव ही खतरनाक है। नृशंस है, रक्तांबर है। देश में इस समय मतदाता सूचियों की कतर-ब्योंत के लिए चलाया जा रहा एसआईआर भी एक तरह की गिलोटिन मानसिकता है। अर्थात गिलोटिन ग्रस्त सिस्टम हो या सरकार जोड़ती कुछ नहीं सिवाय काटने के। गिलोटिनीयता कुत्ते को भी कटखना बना देती है। हमारे एक मित्र कहते हैं कि मैं पोंगा पंडित हूं, वे मुझे घूसखोर पंडित कहने में झिझकते हैं। उनका कहना है कि गिलोटिन फरसा, गडासा या तलवार नहीं है, ये तो एक छाता है, ढाल भी है। इसका इस्तेमाल सरकार विपक्ष के हमलों से बचने के लिए करती है। भाजपा ही नहीं कांग्रेस ने भी एकाध बार गिलोटिन का इस्तेमाल किया है।
बहरहाल देश में इस समय गिलोटिन काल, युग चल रहा है। इसलिए सदैव सतर्क रहने की जरूरत है। गिलोटिन से बचाव की कोई दवा भी नहीं है। किसी तंत्र-मंत्र से भी आप गिलोटिन को बेअसर नही कर सकते। लोकतंत्र को गिलोटिन मुक्त होना चाहिए।


