– राकेश अचल
लंबे समय बाद आज का दिन ऐसा आया है जब लिखने के लिए मेरे पास एक अदद विषय, मुद्दा या कहिए कोई प्रसंग नहीं है। आज का दिन दुख की चादर ओढ़कर आया है। दुख के साथ रहना आसान नहीं होता। मेरे लिए भी दुख ठीक वैसा है जैसे वेदांता समूह के संस्थापक अनिल अग्रवाल का दुख।
अनिल अग्रवाल मेरी दृष्टि में ए-1, ए-2 से अलग किस्म के कारोबारी हैं। उनके इकलौते बेटे अग्निवेश का 49 साल की उम्र में आकस्मिक निधन हो गया। मेरे खयाल से अनिल जी का दुख हिमालय जैसा है। वज्रपात शब्द ऐसे ही दुख के लिए सृजित किया गया है। हम इस दुख को आपस में बांट भी तो नहीं सकते? हम साहित्यकारों के लिए ज्ञानरंजन जी का निधन भी ऐसा ही दुख है। ज्ञानरंजन जी 90 साल के थे, लेकिन उनके जाने के दुख की तुलना अग्निवेश के जाने से उत्पन्न दुख से नहीं की जा सकती। किसी दुख की तुलना किसी दूसरे दुख से नहीं की जा सकती। दुख अतुलनीय होता है। हमारे गांव में एक पुरानी कहावत है कि ‘जिसका मरता है, वही रोता है।’ हकीकत भी यही है।
कुछ दुख निजी होते हैं तो कुछ सामूहिक, सार्वजनिक दुख। अग्निवेश अग्रवाल के जाने का दुख निजी दुख है, जबकि ज्ञानरंजन जी के जाने का दुख सामूहिक दुख है। विषाक्त पानी या शराब पीकर मरने वालों का दुख सामुदायिक दुख होता है। एक दुख वैश्विक भी होता है। उदाहरण के लिए वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण वैश्विक दुख है। दुख सबको दृवित करता है। पाषाण हृदय को भी। तभी तो कुछ लोगों को कार के नीचे किसी पिल्ले के आ जाने से भी अल्पकालिक दुख हो सकता है।
दुनिया में सबके अपने-अपने दुख हैं। किसिम-किसिम के दुख। जितने तरह के लोग, उतने तरह के दुख। किसी को धनहीन होने का दुख, किसी को तनखीन होने का दुख, किसी को संतान न होने का दुख, तो किसी को बिगड़ैल संतान का दुख, काया का दुख, माया का दुख, विफलता का दुख, यानि आप यदि सारे दुख एकत्र कर लें तो दुखों का पहाड़ हिमालय से भी बड़ा हो सकता है। पर जैसे हिमालय फतह किया जाता है, वैसे ही हर दुख एक न एक दिन तिरोहित हो जाता है। मैंने दुनिया में कोई अजर-अमर दुख नहीं देखा।
दुख और सुख दर्शन का विषय हैं। साहित्य का विषय है। कोई दुख को धूप-छांव कहता है तो कोई धूप। दुख को लेकर सबके अपने-अपने अनुभव हैं। दुख से उबरना ही पुरषार्थ है। अनिल अग्रवाल साहब ने अपने बेटे को खोकर जो लिखा है उसे मैं पुरषार्थ है। दुख अवरोधक नहीं, प्रेरक भी होता है। आज मैं दुखी हूं। कल कोई दूसरा व्यक्ति दुखी होगा। परसों तीसरा और ये सिलसिला चलता रहता है रुकता नहीं है। दुख की नदी अपने साथ जितनी पीड़ा और संताप छोड़ता है, उससे ज्यादा बहा भी ले जाता है। दुख आहों और आंसुओं में भीगा, सकुचा सा होता है। दुख स्वर को कातर बनाता आया है। दुख मनुष्य को जितना दृवित करता है उतना ही वज्र भी बनाता है।
दुख किसी को छोड़ता नहीं, लेकिन दुख बहुतों को व्ययपता भी नहीं। महासुखी भी एक न एक दिन दुख से आद्र होता है। आज का दुख आज का दुख है। इसे यहीं छोड़िए, आगे बढ़िये, सम्हालिए अपने आपको, अपने आस-पास को।


