– राकेश अचल
सुर्खियों पर सियाराम के हावी रहने की वजह से वे तमाम खबरें भी बेमौत मर जाती हैं, जिन्हें विमर्श के केन्द्र में रहना चाहिए। ऐसी ही हैरान कर देने वाली खबर मप्र की है। खबर ये है कि केरल में जब शत-प्रतिशत लोग साक्षर हो रहे हैं, तब मप्र में बच्चे पढ़ने से जी चुरा रहे हैं। मप्र ऐसा अजूबा राज्य है जहां छात्रों और शिक्षकों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से गिरावट आ रही है।
मप्र में 2003 से भाजपा की सरकार है, 2014 में ये सरकार डबल इंजन की हो गई, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में भाजपा की सरकार ने मप्र को बर्बाद कर दिया। लगता है कि सरकार प्रदेश के छात्रों को देश की प्रतिस्पर्धा में रखना ही नहीं चाहती। शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की लापरवाही की पोल कभी न खुलती, यदि सरदार पुर के विधायक प्रताप ग्रेवाल ने सरकार से विधानसभा में सवाल न पूछा होता। आपको जानकर हैरानी होगी कि मप्र में पिछले एक दशक में ही स्कूलों में 54 लाख बच्चे और 61 हजार शिक्षक कम हो गए, जबकि निजी क्षेत्र के स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराना आज भी टेढ़ी खीर है। सरकार ने माना कि मप्र में सरकारी स्कूल, बच्चे और शिक्षक लगातार कम हो रहे हैं। प्रदेश में एक दशक पहले एक लाख 14 हजार 972 स्कूल थे, जो आज घटकर 82 हजार 128 रह गए हैं, यानि 32 हजार 844 स्कूलों पर ताला लगा दिया गया।
मप्र ऐसा अभागा राज्य है जहां पिछले एक दशक में 61 हजार 175 शिक्षकों की कमी हो गई। 2014-15 में मप्र में जहां 2 लाख 91 हजार 992 शिक्षक हुआ करते थे वहीं आज ये संख्या घटकर 2 लाख 33 हजार 817 रह गई है, लेकिन सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है। लगता है मप्र सरकार जैसे प्रदेश को कुपढ़ ही रखना चाहती है। सरकारी स्कूलों की बदहाली का आलम ये है कि सूबे के 21193 स्कूलों में 20 से कम छात्र हैं, जबकि 29 हजार 486 स्कूलों में 40 छात्र। आपको जानकर हैरानी होगी कि मप्र में 85 हजार 33 स्कूल ऐसे हैं जहां एक ही शिक्षक है और 28 हजार 716 स्कूलों में मात्र दो शिक्षक जो सभी कक्षाओं में सभी विषय भी पढ़ाते हैं और दफ्तरी का काम भी करते हैं।
दरअसल सरकारी स्कूलों की बदहाली छात्र संख्या में गिरावट की असल वजह है। मप्र में 2010-11 में जहां 133.66 लाख छात्र थे जो आज घटकर मात्र 79.39 लाख रह गए हैं। यानि दस साल में करीब 54.27 लाख कम हो गए। ये तस्वीर निराशाजनक है। इस बीच सरकार ने तमाम स्कूल एक-दूसरे में विलय कर दिए, तमाम शिक्षक सेवानिवृत हो गए लेकिन खाली पद भरे नहीं गए। मप्र सरकार के पास स्कूलों और छात्रों की संख्या में हो रही लगातार कमी का कोई कारण भी नहीं है। सरकार दस साल पहले 82 लाख स्कूली छात्रों को छात्रवृति देती थी, अब ये भी घटकर 58 लाख रह गई है। सरकार ने स्कूलों में छात्रों को गणवेश तक मुफ्त में बांटे, किंतु स्थिति में कोई सुधार नहीं आया, क्योंकि स्कूली शिक्षा शायद उसकी प्राथमिकता में हैं ही नहीं। सरकार पर्यटन और मन्दिरों में उलझी है।
हजारों करोड़ रुपए के कर्ज में डूबी मप्र की भाजपा सरकार से कोई इस समस्या को लेकर सवाल भी नहीं करता। विसंगति ये है कि एक तरफ सरकारी स्कूल वीरान हो रहे हैं, दूसरी तरफ निजी स्कूल गांव-गांव पहुंच रहे हैं और इन स्कूलों में प्रवेश के लिए मारामारी हो रही है। जाहिर है कि मप्र सरकार ने शिक्षा का क्षेत्र निजी क्षेत्र के लिए खुल छोड़ दिया है। सरकार सिर्फ गीता पाठ को ही प्रदेश की खुशहाली और तरक्की का रास्ता समझती है।


