– राकेश अचल
कहावत है कि मौत अगर घर देख ले तो बचना मुश्किल होता है। मप्र और झारखण्ड से राज्यसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने किसे हराना है, किसे जिताना है का तरीका खोज लिया है। अब मुमकिन है कि पार्षद का चुनाव भी इसी तरह हो और देश की सबसे बड़ी अदालत जान-बूझकर कह दे कि हम चुनाव प्रक्रिया नहीं रोक सकते।
मप्र में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र निरस्त करने के लिए 56 इंच का नहीं 72 इंच का सीना चाहिए था, चुनाव आयोग ने मीनाक्षी या उनकी पार्टी को सुने बिना ही अपना फैसला सुना दिया। जब केचुए की काटी मीनाक्षी राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट गई तो वहां भी उन्हें नहीं सुना गया। नामांकन रद्द होना हैरान नहीं करता, लेकिन इरादतन नामांकन रद्द करना और संख्या बल न होते हुए भी सत्ता पक्ष द्वारा उतारे गए उम्मीदवार को विजयी घोषित करना मरती हुई न्याय व्यवस्था का संकेत देता है। झारखण्ड में एक प्रत्याशी को नामांकन पत्र की तमाम खामियों को सुधारने की मोहलत देना और मप्र में बिना सुने नामांकन निरस्त करना ये प्रमाणित करता है कि केंचुआ कठपुतली है और देश की सबसे बड़ी अदालत भी अब भरोसे का मंच नहीं रहा।
लोकतंत्र का स्वास्थ्य किसी भी देश में निष्पक्ष, पारदर्शी चुनाव से मापा जाता है। अदालतों के फैसले लोकतंत्र और संविधान पर होने वाले हर प्रहार को रोकने के लिए होती है, किंतु ये दोनों सुरक्षा कवच ही जब कठपुतली की तरह काम करते नजर आने लगे तो समझिये कि लोकतंत्र का ‘राम- नाम सत्यÓ होने वाला है। यानि सन्निकट है। एक आम आदमी की तरह सब कुछ होते हुए भी मैं अदालतों का सम्मान करता था, अब ये सम्मान समय के साथ घट रहा है। देश की न्याय व्यवस्था में इतनी ताकत नहीं रही कि वो निरंकुशता को रोक सके। न्याय सिर्फ कानून की किताबों में लिखी दफाओं से नही होता। नीयत भी देखी समझी जाती है। पर अब कानून अपना काम न किताबों से करता दिख रहा है और न विवेक से। ये किसी व्यक्ति की आलोचना नहीं बल्कि एक संस्था की शुचिता का सवा है।
हम तमाम लोग दुष्यंत कुमार की परंपरा से आते हैं, इसलिए जब कभी केंचुआ या सुको गड़बड़ाता दिखता है तो हम दुष्यंत कुमार को याद करते है। वे कहते थे- मत कहो, आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। उन्होंने तो ये भी कहा- सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से, क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है। दुष्यंत कुमार के ही शब्दों में- इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पांव घुटनों तक सना है। पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं, बात इतनी है कि कोई पुल बना है। आज संकट घनघोर है। जनता को ये कहना बंद करना पड़ेगा कि कोउ नृप होय हमें का हानि… हानि हो रही है। लगातार हो रही है। हमारा लोकतंत्र, हमारी संप्रभुता, हमारा स्वाभिमान, हमारा संविधान, हमारे नागरिक अधिकार सब खतरे मे है। ये खतरा कोई कांग्रेस, कोई समाजवादी, कोई सेना, कोई तृणमूल नहीं टाल सकता। ये खतरा तभी टलेगा जब आम जनता एकजुट हो, अन्यथा योगी आदित्य नाथ सही कहते हैं कि बंटोगे तो कटोगे, लोग भी, दल भी, समाज भी, धर्म भी, हमारी नैति भी, हमारे मूल्य भी बच नहीं पाएंगे।
मैं बगावत का आव्हान नहीं करता, मैं जागरण की बात करता हूं। देश हमारा, संसद हमारी, सुप्रीम कोर्ट हमारा, केंचुआ हमारा। यदि हमीं इनकी परवाह नहीं करेंगे तो हमारा लोकतंत्र बचाने अमेरिका या चीन से तो कोई आने वाला है नहीं। सो संवैधानिक संस्थाओं को केंच बनने से रोकिये, अन्यथा समय और आने वाली पीढ़ियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। लोकतंत्र का गला घोंटने का इतना दुस्साहस तो आपातकाल लागू करने वाले शासक भी नहीं जुटा पाए थे।


