– ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने भी दिखाई सख्ती, भारत को अब हाई-रिस्क कैटेगरी में डाला
वाशिंगटन, 22 अप्रैल। संयुक्त राज्य अमेरिका में 2025 में एफ-1 वीजा के लिए आवेदन करने वाले 61 फीसदी भारतीय छात्रों को रिजेक्ट कर दिया गया है। यह दर 2023 के 36 फीसदी और 2024 के 53 फीसदी के मुकाबले काफी ज्यादा है, जिससे साफ है कि वीजा मिलना अब पहले की तुलना में ज्यादा मुश्किल हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल छात्रों की योग्यता का मामला नहीं, बल्कि इसमें जियोग्राफी फैक्टर भी काम कर रहा है। यूरोप के छात्रों को जहां 90 फीसदी से ज्यादा की मंजूरी मिलती है, वहीं भारतीय छात्रों को रिजेक्ट कर दिया जाता है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या वीजा प्रक्रिया में क्षेत्रीय असमानता बढ़ रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया ने भी अपनी वीजा नीति सख्त कर दी है। 2026 की शुरुआत में करीब 40 फीसदी भारतीय छात्र वीजा आवेदन खारिज किए गए हैं। इतना ही नहीं भारत को अब हाई-रिस्क कैटेगरी में डाल दिया गया है, जिसके तहत छात्रों को ज्यादा फाइनेंशियल दस्तावेज, विस्तृत अकादमिक रिकार्ड और मजबूत स्टेटमेंट देना होगा। कनाडा में भी स्थिति आसान नहीं है। 2025 में स्टडी परमिट की संख्या 64 फीसदी तक घटा दी गई और 2026 में भी इसमें और 7 फीसदी कटौती का फैसला लिया गया है। सरकार ने छात्रों की संख्या सीमित करने के लिए सख्त कैप लागू किया है, जिससे भारतीय छात्रों के लिए अवसर और कम हो गए हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक अब वीजा फैसले केवल शिक्षा के आधार पर नहीं लिए जा रहे, बल्कि इमिग्रेशन से जुड़ी चिंताएं, घरेलू राजनीतिक दबाव और अवैध रूप से रुकने की आशंका भी अहम भूमिका निभा रही है। इसी वजह से भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे दक्षिण एशियाई देशों के छात्रों पर ज्यादा सख्ती की जा रही है। इसका असर अब साफ दिखाई देने लगा है। स्टडी एब्रॉड सेवाएं देने वाली कंपनियों के कारोबार में 35 से 40 फीसदी तक गिरावट आई है, और छात्रों के बीच अनिश्चितता बढ़ गई है। विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि छात्र घबराएं नहीं, बल्कि अपनी तैयारी को और मजबूत करें, दस्तावेज पूरी तरह सही रखें और आवेदन प्रक्रिया को पारदर्शी व व्यवस्थित तरीके से पूरा करें।


