– राकेश अचल
महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण देने के लिए केन्द्र सरकार 17 अप्रैल से संसद का एक दिवसीय सत्र आहूत कर रही है। सरकार ये प्रमाणित करना चाहती है कि भाजपा सरकार ही महिलाओं का सम्मान करना जानती है, जबकि हकीकत इससे ठीक उलट है।
संदर्भ के लिए आपको बता दूं कि केन्द्र सरकार ने महिलाओं को लोकसभा (संसद) और राज्य विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए संसद का एक तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाया है। सत्र 16, 17 और 18 अप्रैल को होगा। दरअसल यह बजट सत्र का विस्तार है, जिसे 13 दिन के ब्रेक के बाद फिर से शुरू किया जा रहा है। सरकार का मुख्य उद्देश्य 2023 का महिला आरक्षण कानून 2029 के लोकसभा चुनावों से लागू करने की राह साफ करना, ताकि महिलाओं को आरक्षण का लाभ तुरंत मिल सके। इस तीन रोजा सत्र में सरकार कुल तीन विधेयक लाने वाली है। पहला संविधान (131वां संशोधन) विधेयक- महिला आरक्षण अधिनियम में जरूरी संशोधन। दूसरा परिसीमन विधेयक- सीटों की नई व्यवस्था के लिए और तीसरा संघ राज्य क्षेत्रों में विधानसभा वाली जगहों के लिए अलग विधेयक। यानि सरकार एक पंथ तीन काम करना चाहती है।
आपको पता है कि वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं। नए प्रस्ताव के माध्यम से सीटों की संख्या 50 फीसदी बढ़ाकर 816 कर दी जाएगी। इनमें से लगभग 273 सीटें (एक तिहाई) महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर होगा। इससे दक्षिण भारत (केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश आदि) की चिंताओं को दूर करने का दावा किया जा रहा है। उनकी लोकसभा सीटों में कमी नहीं होगी, बल्कि कुल सीटें बढ़ने से प्रतिनिधित्व बरकरार रहेगा। उल्लेखनीय है कि तीन साल पहले 2023 में संसद के विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ था, जो महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देता है। लेकिन इसका क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन पूरा होने के बाद ही होता। अब सरकार इसे तेज करने के लिए संशोधन ला रही है, ताकि 2029 के चुनाव से ही महिलाओं को आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिले।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई रैलियों में इसे 40 साल का इंतजार खत्म बताते हुए कहा कि यह उनकी सरकार की प्राथमिकता है और महिलाओं (नारी शक्ति) को सशक्त करने का कदम है। सरकार ने इन तीनो विधेयकों के लिए विपक्ष से समर्थन मांगा है, जो शायद ही मिले। सरकार कहती है कि यह महिलाओं के सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम है। विपक्ष के साथ चर्चा की जा रही है। बीजेपी ने अपने सांसदों को तीन-लाइन व्हिप जारी किया है, जबकि विपक्ष (खासकर कांग्रेस) इसे चुनावी फायदे (पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु आदि विधानसभा चुनावों) के लिए की जा रही कोशिश बता रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि परिसीमन से संघीय ढांचा प्रभावित हो सकता है।
यह सत्र महिला आरक्षण को लेकर लंबे समय से चली आ रही मांग को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर विधेयक पारित हो गए, तो यह लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने वाला बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। अब असली कहानी सुनिए। भाजपा और आरएसएस का महिला वंदन कोरा नाटक है, क्योंकि आरएसएस ने अपने सौ साल के इतिहास में कभी किसी महिला को संघ प्रमुख नहीं बनाया। संघ ने पहले राजनीति के लिए 1951 में जनसंघ बनाया, लेकिन 26 साल में किसी महिला को अध्यक्ष नहीं बनाया। आज की भाजपा भी 46 साल की हो गई है, लेकिन एक भी महिला नेता को भाजपा की कमान नहीं सौंपी गई। भाजपा चौथी बार केन्द्र की सत्ता में है, लेकिन भाजपा और संघ के पास किसी महिला को प्रधानमंत्री बनाने का साहस नहीं।
महिला वंदन की बात करें तो भाजपा के मुकाबले कांग्रेस ने न सिर्फ चार महिलाओं को अपनी पार्टी का अध्यक्ष बनाया, बल्कि देश को पहली महिला प्रधानमंत्री भी कांग्रेस ने ही दी। अब फैसला आप ही करें कि महिला वंदन हकीकत है या भाजपा का नाटक? संसद का गणित भाजपा के पक्ष में है, न भी हो तो सरकार ध्वनिमत से ये तीनों विधेयक पारित करा कर अपना उल्लू सीधा कर लेगी। किंतु ये भारत की महिलाओं के साथ सबसे बड़ी ठगी होगी। भाजपा यदि महिलाओं के सम्मान को लेकर सचमुच गंभीर है तो शुरुआत घर से करे। संघ में, भाजपा में या सरकार की कमान किसी महिला को दे, और ये होगा नहीं।


