– राकेश अचल
सवा दो साल पहले विधानसभा चुनाव हार चुके डॉ. नरोत्तम मिश्रा को दोबारा चुनाव लड़ाने के लिए उन्हें दतिया की रिक्त विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ाने की गरज से भाजपा मिश्रा को चुनाव में उतारने से पहले मंत्री बनाने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। जब तक इस बारे में कोई आधिकारिक ऐलान नहीं होता तब तक आप इसे चंडूखाने की खबर मान सकते हैं।
भाजपा ने इससे पहले मप्र की श्योपुर जिले की विजयपुर सीट से ये प्रयोग किया था। उस समय पूर्व मंत्री रामनिवास रावत ने कांग्रेस से भाजपा में प्रवेश कया था। तब पार्टी ने उन्हें वन मंत्री बनाया और फिर श्योपुर की विजयपुर सीट से पार्टी प्रत्याशी बनाया था, लेकिन वे कांग्रेस से चुनाव हार गए थे। मप्र के पूर्व मंत्री रावत ने कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा के चुनाव को हाईकोर्ट में चुनौती दी, हाईकोर्ट ने उन्हें रनरअप भी घोषित किया किंतु सुप्रीम कोर्ट ने मुकेश मल्होत्रा को राहत देते हुए उनकी विधायकी को बचा दिया।
रामनिवास रावत की कहानी से अलग नरोत्तम मिश्रा की कहानी है। मिश्रा जी मंत्री रहते हुए दतिया का कायाकल्प करने के बावजूद चुनाव हारे। क्योंकि उनका अहंकार सातवें आसमान पर था। मिश्रा ने भी कांग्रेस विधायक राजेन्द्र भारती के खिलाफ चुनाव याचिका लगवाने के बजाय दतिया भूमि विकास ग्रामीण बैंक में अध्यक्ष पद पर रहते भारती द्वारा की गई एक कथित जालसाजी के मामले में उलझाया। संयोग से भारती को उस मामले में 3 साल की सजा हो गई।
भाजपा सरकार ने रात को ही विधानसभा खुलवाकर भारती की सदस्यता रद्द कर दतिया सीट रिक्त घोषित करने के लिए चुनाव आयोग को लिख दिया। हालांकि भारती अपनी सजा के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील कर चुके हैं और उस पर 15 अप्रैल को सुनवाई है। मुमकिन है कि भारती को भी मल्होत्रा की तरह राहत मिल जाए। लेकिन मिश्रा जी को भरोसा है कि ऐसा कदाचित होगा नहीं।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक यदि चुनाव आयुक्त दतिया सीट रिक्त घोषित करते हैं तो नरोत्तम मिश्रा को ही वहा से चुनाव लड़ाया जाएगा, किंतु इससे पहले उन्हें मंत्री बनाया जाएगा। संभवत: इस मामले में पार्टी संगठन और सरकार के बीच रणनीति बन चुकी है। आपको याद होगा कि खुद डॉ. नरोत्तम मिश्रा को पूर्व में पेड न्यूज प्रकरण में केन्द्रीय चुनाव आयोग अयोग्य घोषित कर चुका है। इस मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत एक दशक बाद भी फैसला नहीं दे पाई है और तब से अब तक पंडित जी दो चुनाव लड़ चुके हैं और तीसरे चुनाव की तैयारी कर रहे हैं।
मिश्रा नरोत्तम चुनाव लड़ें, जीतें या हारें ये मुद्दा विचारणीय नहीं है। मुद्दा ये है कि क्या देश की सबसे बड़ी अदालत कामबाढ़ के बोझ में इतनी दबी है कि उसके पास मिश्रा के विरुद्ध केन्द्रीय चुनाव आयोग की याचिका पर सुरक्षित रखा फैसला सुनाने की भी फुर्सत नहीं है? जाहिर है कि अब केंचुआ भी उनका अपना है और नवगृह भी। मिश्रा जी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का अपेक्षित फैसला इतना ज्यादा सुरक्षित रखा है कि उसके दतिया उपचुनाव (यदि हुआ तो) होने तक भी सुनाए जाने की उम्मीद नहीं है। अब देखिए मां पीतांबरा किसके ऊपर कृपा करती हैं?


