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Home » क्या है “श्री उग्रचण्डीश्वर तन्त्र”की महिमा
Jagran TodayBy Jagran TodayApril 7, 2026

क्या है “श्री उग्रचण्डीश्वर तन्त्र”की महिमा

Jagran TodayBy Jagran TodayApril 7, 2026

📝पण्डित दीपक चौधरी 📞 9826231755

       ।। ।त्रिपुर। चण्डी।। १।।
परम सौभाग्य की बात है कि श्रीविद्या के महनीय क्रम में “श्री त्रिपुरचण्डी” ग्रंथ की मातृका नेपाल से हमें प्राप्त हुई।
इसी ग्रंथ का दूसरा नाम “श्री उग्रचण्डीश्वर तन्त्र” भी है।

इसमें वर्णित ३० अध्यायों में भगवती राजराजेश्वरी ललिता त्रिपुरसुंदरी की कथा निबद्ध है।
यह कथा मूल रूप से त्रिपुरा रहस्य ग्रंथ से ली गई है। लेकिन इसका पाठ और प्रयोग विधि अद्भुत है।

संपूर्ण ग्रंथ ३० अध्यायों में लिखा गया है। इसमें दुर्गा सप्तशती की तरह प्रथम मध्यम और उत्तम, तीन चरित्रों में भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी की कथा लिखी गई है।

नेपाल की शाक्त परम्परा में यह मान्यता है कि शरदादि नवरात्र में नवचण्डीपाठ के बाद नवमी तिथि में इस “त्रिपुर चण्डी” का पाठ करना आवश्यक है, तभी भगवती की साधना पूर्ण होती है।

श्री विद्या चक्रार्चन के बाद भी दुर्गा सप्तशती पाठ का विधान मिलता है।

ऐसे ही नवचण्डीपाठ के बाद इस त्रिपुर चण्डी के पाठ का विधान मिलता है

– हामी दशैंको नवमीको दिनमा देवी त्रिपुरसुन्दरीलाई नै साधेर शारद पूजा सम्पन्न भएको मान्छौं। सप्तशती चण्डीपाठलाई टुंग्याउन तेहौं अध्यायलाई देवी त्रिपुरसुन्दरीकै पाठ गरी टुंग्याउँछौं। प्रष्ट छ, देवी।

त्रिपुरसुन्दरीको आराधना तन्त्रानुसारको पूरक अनुष्ठान हो।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि इसका पाठ करने वाले साधक को तंत्र दीक्षा प्राप्त होना आवश्यक नहीं है। ऐसा नेपाल ग्रंथ की मातृका में स्पष्ट लिखा गया है —

यो पाठ विशिष्ट छ, यो अर्थमा की, यसलाई पाठ गर्ने साधक तन्त्र दीक्षाले सुसज्जित हुनैपर्छ भन्ने छैन ।

अतः सिद्ध है कि यह ग्रंथ शाक्त परम्परा, श्रीविद्या साधना और दुर्गा उपासकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।

हमारे द्वारा प्रकाशित इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि –

१. यह ग्रंथ अदीक्षित और दीक्षित दोनों प्रकार के साधकों के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
हमारा उद्देश्य तो सबको परात्पराम्बा महेश्वरी से जोड़ने का है। इसके भगवती के इतिहास और आख्यान को पढ़ने और सुनने से भगवती त्रिपुरसुंदरी सन्तुष्ट होती हैं ऐसा इसी ग्रंथ में लिखा है –

इतिहासमिदं श्रेष्ठं विचित्रार्थकथायुतम् ।
शृण्वतां पठतां भक्त्या तुष्टा स्यात्त्रिपुराम्बिका।

समस्त शास्त्रों को पढ़ने और सुनने के बाद भी यदि इस कथा को नहीं पढ़ा तो भगवती की साधना और भक्ति में पूर्णता नहीं मिलती है।

इसलिए पूर्णता के लिए इसे नवरात्र में अथवा नवरात्र के अन्त में अवश्य पढ़ना या सुनना चाहिए –
पठत्वशेषशास्त्राणि शृणोत्वखिलसत्कथाः । न यावदेतत्पठितं श्रुतं वा भुवि जायते ॥
तावत् केन श्रुतं नैव पठितं वा भविष्यति । किं बहूक्तेन देवर्षे सर्वसारमिदं भवेत् ।।
एतत्सम्यग्विदित्वा तु नावशिष्यते किञ्चन । यावदेतन्न जानाति तावन्न स्यात्सुपूर्णता ॥

२. पाठक इसके एक एक अध्याय का प्रतिदिन पाठ करके मासिक पारायण भी कर सकते हैं।

३. ग्रंथ में संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाएं दी गई हैं ताकि हिन्दी के पाठक भी इसका पठन या श्रवण कर सकें।

४. इसी ग्रंथ में लिखा है कि सबसे पहले सबके लिए देवी त्रिपुरा की आराधना आवश्यक है॥

बिना भक्ति के करोड़ों जन्म से की गई उनकी पूजा से भी वह दुर्लभ है और बिना उनकी महिमा सुने उनकी भक्ति भी दुर्लभ है॥
अतः व्यक्ति को चाहिए कि सदा श्रद्धायुक्त होकर पूरी निष्ठा के साथ भगवती पराशक्ति त्रिपुरा की कथा सुने और सुनाये ॥
उनकी कथा रोज सुनने से वह दृढ़ भक्ति प्रदान करती हैं, जिससे वह परा सेवा प्राप्त कर अभय पद प्राप्त करता है। इसके सिवा और कोई दूसरी राह उसे पाने की नहीं है।

अतः सबसे पहले उनके प्रति श्रद्धा करनी चाहिए और उनकी महिमा सुननी चाहिए ॥
मनुष्यों के लिए वांछितार्थ प्रदान करने वाली वही कल्पतरु है।

— अत आदौ सर्वजनैः सेव्या सा त्रिपुराऽम्बिका।। सेवनं तु विना भक्त्या दुर्लभा जन्मकोटिभिः। साऽपि तस्याः सुमहिमाऽऽकर्णनेन विना तथा ।। तस्मात्प्रयत्नेन जनैः सदा सुश्रद्धया युतैः। श्रोतव्या कीर्तितव्या च त्रिपुरायाः परा कथा।। शृण्वतोऽनुदिनं सैव दृढां भक्तिं प्रयच्छति । ययाऽऽसाद्य परां सेवां समाप्नोत्यभयं पदम् ।। नान्यः पन्थास्तस्य भवेत्पदस्य प्रापणे क्वचित्। अत आदौ परा श्रद्धा कर्तव्या महिमश्रुतौ ।।।सैव कल्पतरुर्नृणां वाञ्छितार्थप्रसाधने ।।
इसलिए भगवती की महिमा सबके लिए श्रवण व पठन सुलभता हो एतदर्थ ग्रंथ प्रकाशित किया गया है।

५. इस ग्रंथ में भगवती की उत्पत्ति, उनके दिव्य लोकों मणिद्वीप और श्रीपुर का विस्तृत वर्णन किया गया है।
६.इस ग्रंथ में भगवती के ललिता, षोडशी, त्रिपुरा , त्रिपुरसुंदरी, राजराजेश्वरी आदि नामों का विवेचन भी किया गया है ताकि साधक समझ सकें कि यह एक ही देवी हैं या पृथक् पृथक् हैं ।

७. इस ग्रंथ में उल्लेख हुआ है कि भगवती लक्ष्मी जी ने श्रीसूक्त विधि से भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी की हजारों वर्षो तक तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवती त्रिपुरसुंदरी ने लक्ष्मी जी को अपना सायुज्य प्रदान करते हुए कहा कि मेरा श्रीयंत्र और श्री सूक्त आज से तुम्हारे नाम से जाना जाएगा।

और मेरी विद्या भी तुम्हारे नाम से श्रीविद्या के रूप में प्रसिद्ध होगी। आज से तेरी और मेरी में एकरूपता रहेगी और तेरे भक्तों पर मैं भी प्रसन्न रहूंगी।
हे लक्ष्मी! तुम्हारे द्वारा उपासित “श्रीसूक्त” विधान से ही मेरी कृपा, मेरे दर्शन और मेरे श्रीपुर में साधकों को प्रवेश मिल सकेगा। यही बाय भगवती ने बृहस्पति और ब्रह्मादि को तब कही जब उन्होंने कहा कि – मां आप इन्द्रादि देवों को भी दर्शन दो। तब भी भगवती ने कहा कि “श्रीसूक्त” विधान से ये देवता मेरी उपासना करें तो ही मैं इनको दर्शन दे सकती हूं।

अतः इस ग्रंथ के उत्तर भाग में “श्रीसूक्त” विधान से भगवती की सामान्य पूजा और विशेष पूजा प्रयोग विधि दी गई है।

इसके अनुसार भगवती लक्ष्मी का पूजन और बिना दीक्षा के भी लक्ष्मी प्राप्ति हेतु श्रीयंत्र पर लक्ष्मी पूजन की विधि दे दी गई है जिससे सभी साधक मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। इन पूजा प्रयोगों को दीपावली या नवरात्र आदि में विशेष रूप से किया जा सकता है। (क्रमशः)

(लक्ष्मी उपासकों और श्रीविद्या साधकों के लिए अद्भुत संग्रहणीय ग्रंथ है जो भाषा टीका और प्रयोगों सहित विश्व में पहली बार प्रकाशित किया गया है।

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