– राकेश अचल
पिछले दिनों दिल्ली में एआई समिट के दौरान युवा कांग्रेस के शर्टलैस यानि अर्धनग्न प्रदर्शन को भारत की इमेज से जोड़ दिया गया है। सत्ता से लेकर अदालतें तक इस मामले में एक सुर में बोल रही हैं। यानि मामला अब कानून का नहीं, भावनाओं के आधार पर तय किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है जैसे वे राजनीतिक दल के कार्यकर्ता न होकर आतंकवादी हों।
पहले सरकार ने, फिर भाजपा ने और अब दिल्ली की एक अदालत ने कहा कि भारत मंडपम में एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान इंडियन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का शर्टलेस (अर्धनग्न) प्रदर्शन असहमति जताने का सही तरीका नहीं था। कोर्ट ने कहा कि यह प्रदर्शन सार्वजनिक व्यवस्था पर एक सीधा हमला था, जिसने भारत की राजनयिक छवि को भी नुकसान पहुंचाया है। सवाल ये है कि क्या किसी कानून में इस तरह के प्रदर्शन अपराध हैं? क्या बीएनस में ऐसी कोई धारा है जो इस तरह के प्रदर्शर्नों को प्रतिबंधित करती है। क्या ऐसे प्रदर्शन पहली बार हुए हैं? सत्तारूढ़ भाजपा समेत लगभग सभी दल और कर्मचारी संगठन अर्धनग्न प्रदर्शन कर चुके हैं। सवाल अनेक हैं लेकिन उत्तर नदारद है।
ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की कोर्ट ने शनिवार को यह टिप्पणी करते हुए शर्टलेस विरोध प्रदर्शन करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए यूथ कांग्रेस के चार कार्यकर्ताओं को 5 दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया। गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों में बिहार से युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव कृष्णा हरि, बिहार से युवा कांग्रेस के प्रदेश सचिव कुंदन यादव, उत्तर प्रदेश से युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार और तेलंगाना से नरसिंह यादव शामिल हैं।
दिल्ली पुलिस की हिरासत में पूछताछ की अर्जी को मंजूर करने के कारण बताते हुए पुलिस हिरासत के आदेश दिए। लेकिन कोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक जांच के निष्कर्षों से बाहरी साजिश के संबंधों का संकेत मिलने से यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश के एक अंश में कहा गया है कि विरोध प्रदर्शन ने न केवल आयोजन की शुचिता को खतरे में डाला, बल्कि देश की डिप्लोमैटिक इमेज को भी नुकसान पहुंचाया।
सवाल ये है कि क्या जुडीशियल मजिस्ट्रेट के सामने ये परिभाषित करने की विनती की गई है कि प्रदर्शन का चरित्र देशविरोधी था या नहीं? ये तय हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट करता है। लेकिन यहां अदालत बिना किसी आग्रह के सरकार, भाजपा के सुर मे सुर मिलाती दिख रही है। सरकार और अदालत के सुर जब एक जैसे हों तो घबड़ाहट होती है। क्योंकि पुलिस की तो मजबूरी है, लेकिन अदालत परम स्वतंत्र होती है। अदालत जनता के अधिकारों का संरक्षण देती है। पुलिस ने इस मामले में आपराधिक षड़यंत्र, लोक सेवक को चोट पहुंचाने, लोक सेवक के कर्तव्य में बाधा डालना, अवैध सभा और साझा इरादा जैसे गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। पुलिस ने व्यापक षड़यंत्र के कोण की जांच शुरू की है और अन्य प्रदर्शनकारियों की तलाश जारी है।
जाहिर है कि गिरफ्तार प्रदरशनकारियों के बहाने सरकार कांग्रेस से राजनीतिक अदावत निकाल रही है। मुमकिन है कि आने वाले दिनों में इन सभी आरोपियों पर रासुका थोप दी जाए। लद्दाख में सोनम वांग्चुक ने कौन सा अर्धनग्न प्रदर्शन किया था? सोनम पांच महीने से जेल में हैं। क्योंकि सरकार को न सवाल पूछने वाले बर्दास्त होते हैं न प्रदर्शनकारी। ये बात अलग है कि सरकारी पार्टी के कार्यकर्ता मप्र में पुलिस संरक्षण में किसी राजनीतिक दल के दफ्तरों पर पथराव करें।
देश की छवि की चिंता हर भारतीय को होती है, चाहे वो किसी भी दल का हो। किसी भी प्रदर्शन में विदेशी साजिश देखना पुलिस का और पूरे सिस्टम के दृष्टिदोष का प्रतीक है। देश की छवि तब खराब होती है जब केन्द्र सरकार के किसी मंत्री का नाम जेफरी स्टीफन की फाइल में आता है। देश की छवि तब खराब होती है जब आपरेशन सिंदूर में सीजफायर की खबर वाशिंगटन से आती है। देश की छवि तब खराब होती है जब अमेरिका से डील की शर्तों को देश से छिपाया जाता है।
बहरहाल जो हुआ सो हुआ, अब ये राजनीतिक दलों की समस्या है कि वे सरकार और सिस्टम के नऐ फांसीवादी रवैये से कैसे निबटे। अदालत से कोई प्रश्न करने की कोई जरूरत नहीं है। हमारी अदालतों में नीचे यदि फैसले देने और टिप्पणी करने में कुछ गड़बड़ होती है तो बड़ी अदालतें उसे दुरुस्त भी करती ही हैं। भरोसा रखिये देश की न्याय प्रणाली पर।


