– राकेश अचल
आप यकीन करें या न करें ये आपकी मर्जी है, किंतु सत्तारूढ़ भाजपा में दिल्ली से लेकर भोपाल तक कहीं खिचड़ी पक रही है, तो कहीं रायता फैल रहा है। कहीं कोई कोप भवन में बैठा है तो किसी ने अपने नेताओं का अघोषित बहिष्कार रखा है। दिल्ली हमेशा दूर ही रहती है, इसलिए दिल्ली में पकती खिचड़ी का अनुमान लगाना मुश्किल होता है। पकती खिचड़ी की गंध भी बाहर मुश्किल से आती है, किंतु जब एपिस्टीन फाइल, दि काश्मीर फाइल से ज्यादा हिट हो जाती है तब भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की चुनौतियां बढ़ जाती हैं।
भाजपा के नवीन अध्यक्ष को किसी ने पप्पू कहा नहीं है, लेकिन उनकी हैसियत 32 दांतों के बीच रहने वाली रसना जैसी है। वे न किसी को डाट सकते हैं, न फटकार सकते हैं, अर्थात फिलहाल वे पार्टी के पप्पू ही हैं। क्योंकि अभी केन्द्र और राज्यों में नवीन की नहीं मोशा की कृपा ही कम कर रही है। असम में हेमंत विस्वा शरमा से लेकर मप्र, राजस्थान और छग में कहानी एक जैसी है।
बात मप्र की ही कर लेते हैं। सन 2023 के विधानसभा चुनाव में लाडली बहना के सहारे सत्ता में आई भाजपा सरकार इस समय सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल पार्टी में अंदरूनी असंतोष को ठंडा करने में नाकाम साबित हुए हैं। इसका खमियाजा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को भुगतना पड़ रहा है।
मप्र में अपने से कनिष्ठ डॉ. मोहन यादव के नीचे काम करने को विवश किए गए कैलाश विजयवर्गीय ने खुलकर मुख्यमंत्री यादव का बहिष्कार शुरू कर दिया है। इंदौर शहर में रहते हुए भी वे मुख्यमंत्री डॉ. यादव के कार्यक्रमों से दूर रहे। हालांकि मुख्यमंत्री डॉ. यादव कैलाश विजयवर्गीय को साधने की लगाता कोशिश कर रहे हैं। बेचारे मुख्यमंत्री को विजयवर्गीय के विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से किए गए असंसदीय आचरण के लिए माफी तक मांगना पड़ी, किंतु कैलाश का गुस्सा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा।
मद्यप्रदेश के नाम से बदनाम मप्र में पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा मुख्यमंत्री डॉ. यादव की जगह पाने के लिए सार्वजनिक रूप से तंत्र-मंत्र का सहारा ले रहे हैं। मिश्रा जी विधानसभा चुनाव हारने के बाद से अपने और अपने बेटे के भविष्य को लेकर दुखी हैं। अपना गम कम करने के लिए बेचारे ने अपनी तमाम जमापूंजी लगाकर अपने गृहनगर डबरा में एशिया का सबसे बड़ा नवगृह मन्दिर बनाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर दिखाया, लेकिन अभी तक उनकी किस्मत नहीं चेती।
डॉ. मोहन यादव कैसे अपनी सरकार चला रहे हैं ये वे जानते हैं या उनका भगवान। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल उस तरह से मुख्यमंत्री के संकट मोचक नहीं बन पा रहे हैं, जैसे शिवराज सिंह चौहान के लिए तब के पार्टी प्रमुख बीडी शर्मा बने थे। पार्टी संगठन में सत्ता की मलाई का बंटवारा न होने से हर अंचल में असंतोष है। लेकिन निगमों, प्राधिकरणों यहां तक कि स्थानीय निकायों तक में मनोनयन नहीं हो पा रहे हैं। स्थिति ये हो गई है कि भाजपा का सांस्कृतिक चेहरा पथराव करने वाली पार्टी का बन गया है।
संगठनात्मक असंतोष हर राजनीतिक दल की समस्या है। विपक्ष में भी असंतोष खदबदा रहा है। प्रतिपक्ष के उप नेता पद से हेमंत कटारे का सदन के चलते इस्तीफा इसका उदाहरण है, किंतु सत्तारूढ़ दल का संगठनात्मक असंतोष सत्ता प्रतिष्ठान की सेहत ज्यादा खराब करता है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की समझ में नहीं आ रहा कि वे मौजूदा स्थिति से कैसे निबटें, क्योंकि दिल्ली से उन्हें संरक्षण तो मिल रहा है, लेकिन हंटर चलाने की इजाजत नहीं मिल रही। मुख्यमंत्री कभी किसी क्षत्रप को साधते हैं तो कभी क्षत्रप को। लेकिन रायता कहें या शीराजा तेजी के साथ फैलता ही जा रहा है। दिल्ली से लेकर भोपाल तक सत्तारूढ़ दल में पक रही खिचड़ी और फैलते रायते के किस्सों पर 50 अंकों की श्रंखला बन सकती है। फिलहाल इतना ही।


