– राकेश अचल
मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अब सयाने हो गए हैं। उन्होंने प्रदेश में अखण्ड राज करने के लिए अंग्रेजों की डिवाइड एंड रूल(बांटो और राज करो) नीति पर अमल भी शुरु कर दिया है। मुख्यमंत्री ने अपनी इस योजना का बिस्मिल्लाह यानि श्रीगणेश ग्वालियर-चंबल अंचल से किया है।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पुत्र-मोह में धृतराष्ट्र बने पार्टी नेताओं को चिन्हित कर लिया है और वे एक-एक को संतुष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने सबसे पहले अपने वरिष्ठ प्रतिद्वंदी विधान सभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर को खुश करने के लिए कुलैथ के किसान सम्मेलन में तोमर के बेटे रामू उर्फ देवेन्द्र तोमर को मंच पर बुलाकर भावी नेता घोषित कर उनके नाम के जयकारे लगवाए। रामू पिछले एक दशक से अपने पिता की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी के तौर पर सक्रिय हैं।
सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा तोमर पुत्र की सार्वजनिक रूप से राजनीतिक प्राण प्रतिष्ठा किए जाने से तमाम नेताओं की छाती पर सांप लोट गएञ अपने बच्चों को राजनीति में प्रतिष्ठित कराने की चिंता में भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा, पूर्व मंत्री ध्यानेन्द्र-माया सिंह, पूर्व सांसद विवेक शेजवलकर का नाम प्रमुख है। केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंध के लिए अपने बेटे की प्रतिष्ठा कोई समस्या नहीं है। पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा अभी खुद मैदान में हैं।
मप्र भाजपा में 2028 के विधानसभा चुनाव में अधिकांश वरिष्ठ नेता 70-75 पार कर चुके होंगे। ऐसे में उनके राजनीतिक उत्तराधिकार को लेकर घमासान तय है। अनेक केन्द्रीय मंत्री, पूर्व मंत्री, सांसद अपने बच्चों को चुनाव लड़वाना चाहते हैं। खुद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम इस सूची में शामिल है। वे भी अपने एक बेटे को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने के लिए कमर कसे बैठे हैं। पार्टी द्वारा हासिये पर डाले जा चुके इंदौर के भाजपा नेता सत्यनारायण सत्यन ने चुपचाप अपनी बेटी को कांग्रेस में शामिल करा दिया है।
पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने अपने बेटे शुकरत्न का परिचय कराने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर डबरा में नवग्रह मन्दिर बनवा दिया। मुख्यमंत्री के स्वागत में सपरिवार साष्टांग खड़े रहे। लेकिन मुख्यमंत्री यादव ने हाथ रखा नरेन्द्र सिंह तोमर के बेटे की पीठ पर। आने वाले दिनों में ये परिदृश्य और साफ दिखाई देने लगेगा। भाजपा के उन तमाम नेताओं के सामने उत्तरधिकार का संकट है जो 1990 में बा-रास्ते भाजयुमो या स्थानीय निकाय चुनावों के जरीए चुनाव की राजनीति में उतरे थे। मजे की बात मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव उत्तराधिकार के लिए परेशान तमाम नेताओं से जूनियर हैं।
आपको याद होगा कि दूसरे दलों की तरह भाजपा में भी वंशवाद का बोलवाला है। अनेक वंशावलियां भी वजूद में हैं। अनेक पूर्व भाजपा नेताओं के बेटे-बेटियां विधायक और मंत्री भी बन चुके हैं ओर अनेक अभी भी कतार में हैं। सारंग, जोशी, भार्गव, तो जीवंत उदाहरण हैं ही।


