– राकेश अचल
मुझे 14 साल की उम्र तक हिंदू-मुसलमान में फर्क पता नहीं था, क्योंकि मेरे घर के आस-पास कोई मुसलमान नहीं रहता था। मेरे ममाने में भी कोई मुसलमान नहीं था। मामा के गांव जाते वक्त रास्ते में एक गांव पड़ता था, नाम था शहजादपुरा। जाहिर है किसी शहजादे के नाम पर बसा होगा, लेकिन हमने वहां भी कोई शाहजादा नहीं देखा। इस्लाम और मुसलमान से मेरा परिचय बहुत देर में हुआ।
उन दिनों मैं कक्षा 8 का छात्र था, साथ में एक इशाक मोहम्मद या खान भी पढ़ते थे। उनके घर आना जाना शुरू हुआ। उनके अब्बा मदरसा चलाते थे। उन्होंने ही मुझे बताया कि इस्लाम एक मजहब है और मुसलमान एक कौम। दोनों के खानपान और पूजा पद्धति अलग-अलग हैं। उसी समय मैंने रमजान, रोजा, इबादत, जकात, जहन्नुम, जन्नत के बारे में जाना।
इशाक के अब्बा बताते थे कि बेटा! रमजान को रहमत, मगफिरत और जहन्नम से निजात का महीना कहा जाता है। इसी महीने में कुरआन शरीफ नाजिल हुआ था। वे कहते थे कि रोजा रखने का मकसद सिर्फ भूखा-प्यासा रहना नहीं, बल्कि खुद को बुराइयों से बचाना और आत्मा को पाक करना है। क्योंकि रोजा इंसान को सब्र सिखाता है। दिन भर भूखे-प्यासे रहने से गरीबों की तकलीफ का एहसास होता है और इंसान के अंदर शुक्रगुजारी पैदा होती है। रमजान में की गई हर नेक इबादत का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है।
इशाक के अब्बा दोहरे जिस्म वाले थे। उन्हें रोजा रखते मैंने सवाल किया था, आखिर इससे क्या होता है? मुझे याद है कि उन्होंने कहा था कि जो नवदुर्गा में उपवास रखने से होता है वही। उन्होंने ही बताया था कि रमजान में दुआ की खास अहमियत होती है। माना जाता है कि रोजेदार की दुआ इफ्तार के वक्त खास तौर पर कबूल होती है। इसलिए रोजा खोलते समय अल्लाह का शुक्र अदा करना और अपने लिए, परिवार के लिए और पूरी उम्मत के लिए दुआ करना बेहतर होता है। उस जमाने में हमारे गांव में रोजेदार की बड़ी इज्जत होती थी। हर मोहल्ले में रोजा इफ्तार होता था। सेहरी की आवाज सुनकर हम भी पढ़ने के लिए जाग जाते थे, क्योंकि उन दिनों परीक्षा सिर पर होती थी। मैंने ग्वालियर में पूर्व मंत्री रमाशंकर सिंह के आवास पर इफ्तार दावत देखी थी। मैंने भी दो-चार बार घर पर ऐसे आयोजन किए, लेकिन पिछले एक दशक से किसी गैर मुसलमान के घर इफ्तार होते देखने को मैं तरस गया।
बहरहाल इस्लामिक कैलेंडर के नौवें महीने रमजान में रोजा रखना फर्ज माना जाता है। रोजे रखकर और नमाज अदा करके लोग अल्लाह की इबादत कर उनकी रहमत हासिल करने की कोशिश करते हैं। इस कारण रोजा रखने और खोलने से पहले दुआ या नियत (इरादा) करना आवश्यक माना जाता है। यह एक प्रकार का संकल्प है, जो लोग रोजा रखने से पहले लेते हैं। साल 2026 में 18-19 फरवरी को चांद दिखते ही रमजान का महीना शुरू हो गया। रोजा रखने का मुख्य उद्देश्य अल्लाह की इबादत करना और उनकी रहमत प्राप्त करना माना जाता है। रोजा सिर्फ भूखे-प्यासे रहना ही नहीं, बल्कि रूह को शुद्ध करने और नेकी के रास्ते पर चलने की एक कोशिश है।
रमजान महीने में सुबह फज्र की नमाज से पहले सहरी के बाद रोजा रखा जाता है। इसके बाद पूरे दिन भूखे-प्यासे रहकर अल्लाह की इबादत और अपने कर्म को करते हुए शाम को मगरिब की नमाज के बाद इफ्तार किया जाता है। मतलब सुबह सूर्योदय के बाद और शाम को सूर्यास्त के पहले तक रोजा रखा जाता है। ऐसे में रोजा को रखने और खोलने से पहले दुआ पढ़ना आवश्यक माना गया है। रोजा रखने से पहले सहरी के समय नीयत करना जरूरी होता है, क्योंकि यह पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत है। सेहरी के वक्त दुआ के जरिए रोजे की नीयत करना अनिवार्य है।
जब सूरज डूब जाता है और मगरिब की अजान होती है, तब रोजा खोला जाता है। इफ्तार के वक्त दुआ पढ़ना सुन्नत माना गया है और इस समय दुआ कबूल होने की उम्मीद भी ज्यादा होती है। रोजा का सही मतलब तब पता चलता है, जब खुद रोजा रखकर देखो।
एक जमाना था जब देश में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति आवास पर भी रोजा इफ्तार होता था। लेकिन जबसे सरकारों पर देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की धुन सवार हुई है तबसे इफ्तार की दावतें बंद हो गई हैं। जो लोग पहले दावतें देते भी थे, वे भी अब डरने लगे हैं। लेकिन आज भी मौका है कि इस परंपरा को पुर्नजीवित किया जा सकता है. लेकिन सवाल है कि करे कौन? हमारे यहां कोई तारिक रहमान तो है नहीं जो अपने मंत्रिमंडल में किसी हिन्दू या बौद्ध को मंत्री बनाने को समरसता के लिए जरूरी समझता हो। खैर छोड़िए देश में रहने वाले असंख्य रोजेदारों और मुस्लिम भाई-बहनों को रमजान मुबारक। यकीन रखिये- अच्छे दिन जरूर आएंगे।


