– राकेश अचल
फिल्मी दुनिया में टिके रहने के लिए जबरदस्त अभिनय और दर्शकों की बेपनाह मुहब्बत ही नहीं, सियासत भी मायने रखती है। कोई खुलकर सत्ता प्रतिष्ठान के सामने खड़ा होता है तो कोई चुपचाप भागवत कथा सुनने लगता है। हाल ही में मुंबई में दो घटनाओं ने सिने अभिनेताओं की राजनीति पर लिखने को मसाला दिया।
पहली खबर ये कि मुंबई विश्वविद्यालय ने वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को अपने यहां छात्रों से संवाद के लिए आमंत्रित किया और जब शाह ने रजामंदी दे दी तब कुछ दिन बाद विश्वविद्यालय ने उनसे न आने के लिए भी कह दिया। छात्रों से कहा गया कि नसीरुद्दीन शाह ने आने से इनकार कर दिया है। शाह इस हरकत से दुखी हो गए और उन्होंने आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी ने बाद में दर्शकों को ये कहकर गुमराह किया कि उन्होंने खुद आने से मना किया था, जबकि ये बात पूरी तरह गलत है। अपने खत में नसीरुद्दीन शाह लिखते हैं कि उन्हें इसलिए हटाया गया, क्योंकि वो खुले तौर पर देश के खिलाफ बोलते हैं। इस आरोप पर उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर ऐसा है तो कोई एक भी उदाहरण सामने लाया जाए जिसमें उन्होंने देश की बुराई की हो।
नसीरुद्दीन शाह ने साफ किया कि उन्होंने कभी सत्ता में बैठे लोगों की अंधी तारीफ नहीं की। उन्होंने किताबों में बदलाव, साइंस से छेड़छाड़ और नेताओं द्वारा माइनॉरिटी को निशाना बनाए जाने जैसे मुद्दों पर चिंता जताई। एक्टर ने अंत में लिखा कि आज हालात ऐसे बन गए हैं जहां सवाल पूछना और चुप ना रहना ही देशद्रोह मान लिया जाता है, उन्होंने सवाल किया कि ये नफरत और चिड़चिड़ापन कब तक चलेगा? अब दूसरी खबर पर गौर फरमाएं। खबर है कि मुंबई के नेहरू सेंटर में आरएसएस के शताब्दी कार्यक्रम के तहत आयोजित दो दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला में सलमान खान मोहन भागवत का भाषण सुनते नजर आए। उनके साथ सुभाष घई और प्रसून जोशी भी मौजूद थे। भागवत ने कहा कि संघ बिना किसी का विरोध किए देश और राष्ट्रीय एकता के लिए काम करता है और सत्ता की चाह नहीं रखता। कार्यक्रम में वरिष्ठ संघ नेता और वक्ताओं ने समाज में संघ की भूमिका और भविष्य की दिशा पर चर्चा की।
मुंबई में संघ के शताब्दी समारोह के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में शनिवार को बॉलीवुड स्टार सलमान खान, संघ प्रमुख मोहन भागवत का भाषण ध्यान से सुनते नजर आए। कार्यक्रम के दौरान सलमान खान पूरी तरह भाषण में डूबे दिखे। सलमान खान के साथ प्रसिद्ध फिल्म निर्माता सुभाष घई और जाने-माने गीतकार, कवि और लेखक प्रसून जोशी भी मौजूद थे. तीनों ने मोहन भागवत के संबोधन को गंभीरता से सुना। सहज प्रश्न है कि सलमान खान, सुभाष घई भागवत को सुनने मजबूरी में गए या स्वेच्छा से? आपको याद होगा कि सलमान खान और सुभाष घई को लेकर भाजपा और संघ का रवैया एक-सा नहीं रहा। वक्त, मुद्दे और सियासी जरूरत के हिसाब से बदलता रहा है। सलमान खान जब काला हिरण शिकार मामले में फंसे तब और कुछ फिल्मी दृश्यों/ बयानों पर संघ समेत अनेक हिन्दू संगठनों ने सलमान का कड़ा विरोध किया। कई बार भाजपा नेताओं ने भी कानूनी प्रक्रिया पर जोर देते हुए आलोचना की।
संघ के साथ ही भाजपा ने भी सलमान को कभी अपना पोस्टर बॉय नहीं बनाया। न समर्थन, न खुला बहिष्कार- बस दूरी। वैसे अपने बेटे को अभयदान दिलाने के लिए सलमान खान के अब्बाजान सलीम खान ने पहले ही संघ के मंचों पर आना जाना शुरू कर दिया था। यहां बता दूं कि संघ आम तौर पर फिल्मी सितारों पर सीधी टिप्पणी से बचता है, वह संस्कृति/ मूल्य की बात करता है, व्यक्ति-विशेष को नहीं। हालांकि सलमान को जिस तरह से लारेंस विश्नोई ने जान से मारने की धमकी दी, उनके घर पर फायरिंग की उससे घबड़ाए सलमान के पास संघ और भाजपा की शरण में जाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचा था। बाहर से लगता है कि संघ और भाजपा सलमान के मामले में रवैया इश्यू-आधारित रहा—विवाद हुआ तो विरोध, वरना चुप्पी साध लेते हैं।
जहां तक सुभाष घई का संघम शरणम गच्छामि होने का सवाल है तो घई भारतीय संस्कृति, शिक्षा और सिनेमा के भारतीयकरण पर खुलकर बोलते रहे। संघ के मंचों पर उनकी मौजूदगी ने संवाद को वैचारिक रंग दिया। उनके प्रति भाजपा का रुख उदार रहा है। न खुला राजनीतिक समर्थन किंतु संस्कृति-अनुकूल सिनेमा की बातों को सहज स्वीकृति। घई पर बड़े पैमाने पर हिंदू संगठनों का विरोध नहीं दिखा। वैसे भी घई के साथ संघ और भाजपा का रवैया संवादात्मक और सहिष्णु रहा।
मुझे लगता है कि सलमान खान को संघ की शरण में सुभाष घई लेकर गए होंगे। संघ को भी इस समय दिखावे के लिए सलमान खान जैसे डरे हुए ब्रांड चाहिए, क्योंकि बौद्धिक रूप से चर्चित नसीरुद्दीन शाह और जावेद अख्तर जैसे लोग तो भाजपा तथा संघ के साथ खड़े होने के लिए सपने में भी तैयार नहीं हैं। फिल्मी दुनिया अपने प्रारंभिक काल से ही राजनीति के आगे-पीछे चलती रही है। आजादी के पहले ये साफ नजर आता था कि अधिकांश हीरो, हीरोइन, लेखक, निर्माता कांग्रेस के साथ थे। जो साथ नहीं थे उन्हें राजनीतिक कोप का शिकार होना पड़ा। किशोर कुमार इसका उदाहरण हैं। भाजपा के सत्ता में आने के बाद ये विभाजन साफ नजर आने लगा है। अब फिल्मी दुनिया में दो धाराएं हैं। एक कांग्रेसी और धर्मनिरपेक्ष लोगों की और दूसरी भाजपाई और आधुनिक राष्ट्रवादियों की। आने वाले दिनों में ये विभाजन और तेज हो सकता है।


