– राकेश अचल
हमारी सरकार ने मनरेगा को ही नहीं बल्कि महात्मा गांधी और उसके फौरन बाद पूज्य बापू को आखिर राम-राम कर ही ली। मैंने उसी दिन कहा था कि सरकार को मनरेगा से ज्यादा महात्मा और गांधी शब्द से ऐतराज है। मेरी आशंका सौ फीसदी साबित हुई। आप इस दुस्साहस के लिए हमारी सरकार और सरकार को महात्मा गांधी का सफाया करने का हौसला देने वाले स्वयंसेवी संगठन को चाहें तो बधाई दे सकते हैं।
आपको याद होगा कि मनरेगा दुनिया में ग्रामीण क्षेत्र के लिए बनाई गई सबसे बड़ी योजना थी और इसके पीछे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सोच थी। ये योजना 2005 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने लागू की थी। मनरेगा में मजदूरी राज्य के हिसाब से अलग-अलग तय होती है। मौजूदा सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून को खत्म कर नया ग्रामीण रोजगार कानून बनाने का मन बना लिया है। इसे मौजूदा शीतकालीन सत्र में चर्चा के लिए सूचीबद्ध भी किया गया है और भाजपा सांसदों को इसीलिए व्हिप भी जारी किया गया है। नए कानून का मसौदा सोमवार को लोकसभा सांसदों के बीच वितरित किया गया। मनरेगा के स्थान पर आने वाली योजना का नाम ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल, 2025’ रखा गया है।
मौजूदा सरकार को ग्रामीण रोजगार योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाने का साहस जुटाने में पूरे 11 साल लगे। पहले सरकार ने महात्मा गांधी को पूज्य बापू बनाया और जब देखा कि कहीं से कोई विरोध का कोई पहाड़ नहीं टूटा तो तीन दिन बाद ही पूज्य बापू से भी हमेशा के लिए नमस्ते करते हुए जी राम जी ले आए। सवाल योजना को नया रूप देने का नहीं है। सवाल महात्मा गांधी इलियास पूज्य बापू के मान मर्दन का है। मनरेगा के स्थान पर ग्रामीण जनता को रोजगार देने से पहले ही जी रामजी कहलवाने की सोच ही उस सोच का विस्तार है जिसने 1948 में महात्मा गांधी की नृशंस हत्या की थी। यानि पहले महात्मा गांधी की हत्या की गई और अब उनके नाम की हत्या की जा रही है। अब ये मामला प्रशासनिक नहीं बल्कि विषाक्त राजनीतिक विचारधारा का बन गया है।
मनरेगा के जी रामजी हो जाने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि इस योजना से शहर में रहने वाले लोगों को रोजगार की गारंटी नहीं मिलती, लेकिन उन असंख्य भारतीय ग्रामीणों पर इसका असर जरूर पड़ेगा। सरकार इस योजना का नाम बदलकर जहां गांधी से पिंड छुड़ा रही है, वहीं लोगों से जबरन जी रामजी कहलवाना चाहती है। अब यदि सरकार अपने मकसद में कामयाब हो रही है तो ये गांधी वादियों के लिए डूब मरने की बात है।
मैं भविष्य वक्ता नहीं हूं किंतु भविष्यवाणी कर सकता हूं कि यदि मनरेगा से महात्मा गांधी आसानी से विलग कर लिए जाते हैं तो 2029 तक भारतीय मुद्रा से भी महात्मा गांधी की विदाई हो जाएगी और गांधी का स्थान जी रामजी ले लेंगे। गांधी कुछ संगठनों और राझनीतिक दलों की आंख की किरकिरी आज से नहीं बल्कि भारत के आजाद होने के पहले से हैं। इसीलिए आजादी मिलने के फौरन बाद गांधी की हत्या कर दी गई। हत्यारों के समर्थक गांधी की हत्या को वध कहकर महिमा मंडित तक करते हैं।
ग्रामीण रोजगार के लिए बनाए गये महात्मा गांधी विहीन विधेयक में कहा गया है कि इसका उद्देश्य ‘विकसित भारत 2047’ के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप ग्रामीण विकास का नया ढांचा तैयार करना है। काम के दिनों की संख्या 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी जाएगी। सामाजिक-आर्थिक बदलावों को देखते हुए लिए गये इस गांधी विरोधी विधेयक में लिखे हुए उद्देश्य के मुताबिक, पिछले 20 वर्षों में मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों को रोजगार दिया, लेकिन गांवों में हुए सामाजिक-आर्थिक बदलावों को देखते हुए इसे और मजबूत करना जरूरी है।
नए कानून के तहत हर ग्रामीण परिवार को जो बिना कौशल वाला काम करने को तैयार हो, हर साल 125 दिन का वेतनयुक्त रोजगार मिलेगा। इसका मकसद विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप गांवों का समग्र विकास करना है। नए विधेयक के कानून बनते ही मनरेगा पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा। नया विधेयक साफ तौर पर 2005 के मनरेगा कानून को रद्द करने की बात करता है। यानी नया कानून लागू होने के बाद सिर्फ श्रीराम जी ही लागू रहेगा। नया कानून संसद से पास होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद लागू होगा। इसके लिए राष्ट्रपति अपनी कलम खोलकर बैठी हैं, क्योंकि उन्हे भी महात्मा गांधी का नाम हटाने से कोई आपत्ति नहीं है।
विधेयक के मुताबिक, कानून लागू होने के 6 महीने के भीतर राज्यों को अपनी नई योजना बनानी होगी। राज्यों को नए सिस्टम के तहत नया पंजीकरण/ पहचान व्यवस्था लागू करनी होगी, जो डिजिटल और बायोमेट्रिक आधारित होगी। विधेयक में मजदूरी की तय राशि का साफ उल्लेख नहीं है। इसका मतलब है कि मजदूरी दरें केन्द्र और राज्य सरकारें अलग-अलग तय करेंगी, जैसे अभी मनरेगा में होता है। फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि मजदूरी बढ़ेगी या नहीं। विधेयक में 100 के स्थान पर 125 दिन का रोजगार गारंटी के रूप में देने की बात कही गई है लेकिन कुछ शर्तों के साथ। जैसे परिवार ग्रामीण क्षेत्र का होना चाहिए, वयस्क सदस्य बिना कौशल वाला श्रम करने को तैयार हों और काम सरकार द्वारा तय सार्वजनिक कार्यों में ही मिलेगा। यानी यह अपने-आप नहीं, बल्कि काम मांगने पर मिलेगा।
नया कानून जी रामजी इस स्थिति को ध्यान में रखकर लाया गया है। राज्य सरकारों को अधिकार होगा कि वे बोवाई और कटाई के समय कुछ अवधि के लिए इन कामों को अस्थायी रूप से रोक सकें, ताकि खेतों में मजदूरों की कमी न हो, किसान और मजदूर दोनों को नुकसान न पहुंचे। इसका मतलब है कि उस समय मजदूर खेती में काम कर सकेंगे और सरकारी काम बाद में दिए जाएंगे।
महात्मा गांधी ही नहीं दूसरे नेहरू और गांधियों के नाम से घृणा के चलते पिछले 11 साल में करीब 32 योजनाओं के नाम बदले जा चुके हैं। सरकार को गांधी नेहरू से ही नहीं, अल्लाह से, औरंगजेब से, हबीब से, कासिम से भी नफरत है, इसलिए जिन शहरों, सरायों, टेशनों के नाम इन विजातीयों के नाम पर थे उन्हें भी बदल दिया गया। काम करने के बजाय नाम बदलना ज्यादा आसान होता है।


