– राकेश अचल
झण्डे को लेकर ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊंचा रहे हमारा’ गीत 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में स्वीकार किया गया था। इस गीत की रचना करने वाले श्यामलाल गुप्त पार्षद कानपुर में नरवल के रहने वाले थे। अब इस झण्डा गीत को भाजपा ने अपनी सुविधा से बदल लिया है। अब अयोध्या में श्रीराम मन्दिर के शिखर पर धर्मध्वज फहराने वाले लोग शायद बुदबुदा रहे थे कि ‘झण्डा ऊंचा रहे हमारा, भारत हिन्दू बने हमाराÓ।
विश्व में भारत की पहचान तिरंगे राष्ट्र ध्वज से होगी या किसी धर्मध्वज से ये सोचना पड़ेगा, क्योंकि इस समय राष्ट्र ध्वज तिरंगा हो या राष्ट्रीय संविधान दोनों खतरे में हैं। तिरंगे से ऊपर अभी तक किसी दूसरे रंग का ध्वज नहीं फहराया गया, किंतु अब ऐसा करने की कोशिश हो रही है। श्रीराम मन्दिर के शिखर पर धर्मध्वज फहराना धर्म गुरुओं का काम है, यही काम यदि देश के प्रधानमंत्री करें तो शंका होती है।
भारत अतीत में कैसा राष्ट्र था, राष्ट्र था भी या महाराष्ट्र था, इसको लेकर विवाद हैं, अंतहीन विवाद। आजादी से पहले भारत में हिन्दू, मुसलमान और आदिवासी राजाओं और नबाबों की सल्तनतें थीं। सबके अपने-अपने डण्डे झण्डे और निशान तथा विधान होते थे। मेरे ख्याल से त्रेता का रामराज भी आज के भारत तक व्यापक नहीं था। श्रीराम अवधेश कहे जाते हैं, इसी अवध के नबाब वाजिद अली शाह हुआ करते थे। भारत आजाद हुआ तो नबाबियां भी गईं और राजे महाराजे भी। उनके डण्डे झण्डे भी संग्रहालयों में रख दिए गए। भारत एक संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बन गया।
आज की सरकार को न धर्मनिरपेक्ष भारत पच रहा है और न उसका गणतांत्रिक स्वरूप। न संविधान हजम हो रहा है न राष्ट्र ध्वज। भाजपा में सत्ता हाथ में आने के बाद बहुत कुछ बदला। जिलों, शहरों, रेल स्टेशनों के नाम बदले, लेकिन वे राष्ट्र का डण्डा और झण्डा तथा संविधान नहीं बदल सके। मुझे लगता है कि संविधान और निशान (झण्डा) न बदल पाने की टीस जब भी भाजपा और भाजपा की प्रसूता आरएसएस को चुभती है, तब सब राम नामियां ओढ़कर संत बनने की कोशिश करने लगते हैं।
धर्म नितांत व्येक्तिक विषय है। इसे राष्ट्र पर नहीं थोपा जा सकता, लेकिन अब ये कोशिश की जा रही है। ये कोशिश वे हारे-थके लोग कर रहे हैं जो देश आजाद होने के बाद जन्मे हैं। जिन्हें घुट्टी में सांप्रदायिता पिलाई गई है। सांप्रदायिकता की घुट्टी पीने वाले समरसता की घुट्टी का स्वाद और प्रमाद क्या जानें। उनकी नजर में पूरे देश का एक धर्म, एक विधान, एक निशान, एक प्रधान और एक पकवान होना चाहिए। हमारे भाजपा और संघ के मित्रों के लिए पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद शायद यही है।
मैं पं. दीनदयाल उपाध्याय के प्रति शुरू से श्रद्धानवत रहा हूं, क्योंकि मेरी पत्नी भी उपाध्याय गोत्र की हैं। उसने पं. दीनदयाल उपाध्याय को कभी नहीं पढ़ा, किंतु उनका आदर करती हैं, ये अंधश्रद्धा का लघु रूप है। यही अंधश्रद्धा जब व्यापक होती है तो शीतल समीर बनने के स्थान पर पावक हो जाती है और पावक, दाहक होती है। समरसता हो या धर्मनिरपेक्षता हो सब जला देती है।
मैं बात कर रहा था धर्मध्वजा और संविधान की। मुझे पूरा दृढ़ विश्वास है कि भारत का संविधान, भारत का राष्ट्र ध्वज आने वाली एक सदी में तो बदलने की ताकत किसी राजनीतिक दल को हासिल होगी नहीं। भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण भी थे और हिन्दू भी, लेकिन उन्होंने अपने ब्राह्मणत्व और हिन्दुत्व को राष्ट्र के ऊपर आच्छादित करने की कोशिश नहीं की। आज ऐसी नाकाम कोशिशें की जा रही हैं। धर्मगुरुओं को अपमानित, उपेक्षित कर की जा रही हैं।
भारत में बहुत कुछ सनातन है। प्रेम सनातन है तो घृणा भी सनातन है। सांप्रदायिकता भी सनातन है। किंतु हर सनातन चीज सर्वस्वीकार्य नहीं होती। आजादी के बाद के भारत में तो सांप्रदायिकता, घृणा बलवती कभी नहीं हो सकी। भगवान श्रीराम की कृपा होगी तो भविष्य में भी सांप्रदायिक शक्तियां शक्तिमान नहीं बन पाएंगी। राम राज का अर्थ मन्दिर बनाना या धर्म ध्वज फहराना नहीं है। राम राज का अर्थ सभी की खुशहाली, सभी के शोक का शमन, बैर की समाप्ति और गैर बराबरी का खात्मा करना है। लेकिन भाई लोग न रामायण पढ़ते हैं, न रामचरित मानस। रामराज के बारे में जानेंगे कैसे?
श्रीराम मन्दिर पर धर्मध्वजा फहराने का हक मोटाभाई को किसने और क्यों दिया, ये शोध का विषय है। लेकिन इस ध्वजारोहण समारोह में हमारे चार असली शंकराचार्यों और बांकी तमाम आचार्यों की गैर हाजरी, स्थानीय सांसद की उपेक्षा साफ बता रही है कि श्रीराम मन्दिर के शिखर पर धर्मध्वजा हिन्दुत्व के लिए नहीं, राजनीति के लिए फहराई गई है। रामजी सब देख रहे हैं और महाराज दशरथ से पूछ रहे हैं कि आप दूसरों के सपनों में कब से जाने लगे?


