– राकेश अचल
आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है, ये जुमला होश सम्हालते ही रट लिया था, पर आज आविष्कार ही मनुष्यता को भयाक्रांत कर रही है। इस दशक का सबसे बड़ा आविष्कार एआई यानि आर्टीफीसियल इंटेलीजेंस अर्थात कृत्रिम मेधा मनुष्य को सबसे ज्यादा भयभीत कर रही है।
ताजा खबरों के मुताबिक एआई के डर से सिर्फ 8 दिन में 6 लाख करोड़ डूबे, अब टीसीएस और इन्फोसिस समेत बड़ी आईटी कंपनियों ने अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव किए हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर बढ़ती आशंकाओं का असर सिर्फ नौकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि शेयर बाजार पर भी इसका सीधा प्रभाव दिख रहा है। पिछले आठ कारोबारी दिनों में आईटी स्टॉक्स में भारी बिकवाली के चलते करीब 6 लाख करोड़ रुपए की मार्केट वैल्यू घट चुकी है। निफ्टी आईटी इंडेक्स में 8 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है, जो निवेशकों की चिंता को दर्शाता है।
सबसे पहले आपको बता दूं कि आईटी कोई रातों-रात का आविष्कार नहीं है। सन 1956 में अमेरिका के शीर्ष कंप्यूटर विशेषज्ञ जान मैकार्थीने डार्ट माउथ सम्मेलन में पहली बार आयोजित की। पहली बार एआई यानि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द का औपचारिक उपयोग किया था। आप कह सकते हैं कि एआई कोई अचानक पैदा हुई तकनीक नहीं है। एआई 1956 में जन्मी, लेकिन 2023 के बाद अचानक हर घर में चर्चा और बाद में बाजार को आतंकित करने वाली तकनीक क्यों बन गई? तो सीधी वजह है- तकनीक पहली बार आम आदमी के हाथ में आ गई। आज चैट जीपीटी ने एआई को घर-घर पहुंचा दिया है। चैट जीपीटी ने 2022 में लॉन्च किया और सिर्फ 2 महीनों में 100 मिलियन यूजर्स बना लिए। पहली बार लोग खुद एआई से बात करने लगे, पहले ये एआई पर्दे के पीछे काम करती थी। अब सीधे स्क्रीन पर दिखने लगी है। तस्वीर, वीडियो, आवाज सब बनाने लगी है इस तकनीक से चलने वाली मशीन।
एआई जैसे जादूगर हो, इधर टेक्स्ट लिखो उधर फोटो तैयार, इधर स्क्रिप्ट दो उधर पलक झपकते ही वीडियो तैयार, आवाज दो और क्लोन तैयार, बस मशीन की इसी रफ्तार से डर भी शुरू हुआ, लगने लगा कि एआई की वजह से तो नौकरी चली जाएगी? लेकिन सच-झूठ कैसे पहचानेंगे? आज दुनिया में प्रमुख 3 कंपनियों के बीच एआई को लेकर होड़ है। ओपन एआई, गूगल और माइक्रोसाफ्ट ने इस आक्रामक तकनीक पर अरबों डॉलर का निवेश किया है। हर कंपनी अपने एआई टूल लॉन्च कर रही है। एआई अब सिर्फ रिसर्च नहीं, बिजनेस का हथियार बनती जा रही है। आज दुनिया में मोबाइल+इंटरनेट+डेटा सबसे बड़ी दौलत है। अब हर जेब में स्मार्टफोन है। एआई को चाहिए डेटा और दुनिया ने उसे भरपूर डेटा दे दिया। आज एआई लोवान के धुएं की तरह हर क्षेत्र में फैल गई है। सिर्फ लैब में नहीं आपके मोबाइल में, शोध का विषय हो या रोजमर्रा का औजार, लेखन, वीडियो, कोड, डिजाइन, पढ़ाई सबको एआई सरल बना रही है। फिर भी दुनिया एआई से आतंकित है। डरी हुई है। दुनिया के शेयर बाजारों में गिरावट इस भय का जीवंत प्रमाण है। मैंने पहले ही कहा कि एआई नई नहीं है। पूरे 70 की हो चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब वह दिख रही है। पहले मशीन इंसान की मदद करती थी। अब मशीन इंसान जैसी बात करने लगी है। यही बदलाव चर्चा को तूफान बना रहा है। लोग एआई को भस्मासुर मानने लगे हैं। प्रतिद्वंदी मानने लगे हैं।
एआई का आईटी जगत पर जबरदस्त असर है। बाजार में डर इस बात का है कि एआई आधारित टूल्स एप्लिकेशन डेवलपमेंट, मेंटिनेंस और टेस्टिंग जैसी पारंपरिक आईटी सर्विसेज को काफी हद तक ऑटोमेट कर सकते हैं। इससे कंपनियों के मौजूदा बिजनेस मॉडल और मार्जिन पर दबाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इस डर के बीच प्रमुख सॉफ्टवेयर कंपनियां लगातार यह भरोसा दिला रही हैं कि एआई उनकी सेवाओं को खत्म नहीं करेगा, बल्कि उन्हें और सक्षम बनाएगा। तर्क दिया जा रहा है कि एआई नए अवसर भी पैदा करेगा और आईटी कंपनियां इस बदलाव से लाभ उठा सकती हैं। एआई मौजूदा बिजनेस मॉडल के भीतर ही काम करेगा, जहां आईटी सर्विस प्रदाताओं की भूमिका बनी रहेगी।
मैं पिछले दिनों से एआई का इस्तेमाल कर रहा हूं और दावे के साथ कह सकता हूं कि कि एआई किसी मैजिक बॉक्स की तरह अकेले काम नहीं कर सकता। उसे डेटा सिस्टम, ऑडिट चेक्स, साइबर सुरक्षा और रिस्क कंट्रोल जैसे मजबूत ढांचे के साथ ही असली मानवीय मेधा की जरूरत होती है, जिसमें आईटी वेंडर्स और एंटरप्राइज प्लेटफार्म की अहम भूमिका होती है। एआई का दबाब कहिये या डर दुनिया की प्रमुख आईटी कंपनियां अब एआई को लेकर सैद्धांतिक चर्चा से आगे बढ़कर व्यावहारिक बदलाव कर रही हैं। वे अपने ऑपरेशंस में एआई कोडिंग असिस्टेंट, ऑटोमेशन टूल्स और एआई एजेंट्स का तेजी से इस्तेमाल कर रही हैं, ताकि उत्पादकता बढ़ाई जा सके और डिलीवरी टाइम कम किया जा सके। देखिए आगे होता है क्या?


