– राकेश अचल
भारत की सरकार एक रिटायर्ड जनरल की आत्मकथा से व्यथित है, थरथर कांप रही है, क्योंकि इस आत्मकथा से सरकार के शौर्य, पराक्रम और झूठ का पर्दाफास होता दिखाई दे रहा है। मेरा दुर्भाग्य है कि जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब ‘फोर स्टार आफ डेस्टिनी’ की जब प्री बुकिंग हो रही थी तब मेरे पास किताब खरीदने के लिए 3296 रुपए नहीं थे। होते तो मैंने इसे पढ़ लिया होता।
सेवानिवृत सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे पर मुझे क्या पूरे देश को गर्व है। अविभाजित महाराष्ट्र में 22 अप्रैल 1960 को जन्मे मनोज को उनकी सेवाओं के लिए इसी सरकार से परम विशिष्ट, अतिविशिष्ट सेवा पदक दिए गए हैं और आज यही सरकार मनोज नरवणे की आत्मकथा से कांप रही है। मनोज मुकुंद नरवणे खुशनसीब हैं कि लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी जैसे सुधी पाठक उनकी उस किताब को मिले जो अब छपकर भी नहीं छपी। सरकार के डर से प्रकाशक पेगुइन ने भी झूठ बोलना शुरू कर दिया कि किताब छपी ही नहीं है। पेगगुइन का डर समझा जा सकता है। एक प्रकाशक में इतना साहस नहीं होता कि वो किसी संप्रभु और तानाशाह सरकार से टकरा सके। पेगुइन पर दया आती है।
बहरहाल किस्सा ये है कि राहुल गांधी ने एक फौजी जनरल की किताब को ऐसी बोफोर्स तोप में बदल दिया है जो मोदी सरकार के परखच्चे उड़ाने में समर्थ है। जनरल नरवणे ने किताब लिखते समय शायद इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि वे जो सच लिख रहे हैं वो एक दिन देश की लूली-लंगडी सरकार की नींद हराम कर देगा। मेरा दुर्भाग्य ये है कि मैं नरवणे साहब की आत्मकथा पढ़ नहीं सका, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि एक जनरल ने अपनी आत्मकथा में जो भी लिखा होगा वो पूरी ईमानदारी से लिखा होगा। दर असल आत्मकथा लिखना बहुत आसान काम नहीं है। मैंने महात्मा गांधी से लेकर बेचन शर्मा उग्र तक की आत्मकथाएं पढ़ीं हैं। मैं खुद एक लेखक होने के नाते जानता हूं कि आत्मकथा लिखना उतना आसान नहीं है जितना सुबह सुबह, सूरज का उगना। आत्मकथा तो एक कोशिश है पत्थर पर मोमबत्ती से खुद को उकेरने की।
मजे की बात ये है कि एक तरफ राहुल गांधी जनरल नरवणे को उदघृत कर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार राहुल गांधी को, जनरल नरवणे को और पेगुइन को झूठ साबित करने में लगी है। हकीकत ये है कि न जनरल नरवणे झूठे हैं न राहुल गांधी। झूठा पेगुइन भी नहीं है किंतु सरकार के दबाब में झूठ बोलने के लिए मजबूर है। पर आज के डिजिटल और एआई के युग में झूठ छिपता नहीं है। सरकार में इतना साहस नहीं कि वो जनरल नरवणे की किताब पर प्रतिबंध लगा दे। सरकार में इतना साहस नहीं है कि वो कथित गलतबयानी के लिए एक जनरल को गिरफ्तार करा ले। सरकार फंस गई है। एक तरफ एपस्टीन फाइल सरकार के चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है, तो दूसरी तरफ फोर स्टार ऑफ डेस्टिनी सरकार के चरित्र को बेनकाब कर रही है।
मंैने इधर-उधर से फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी के बारे में जितना पढ़ा है उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि ये आत्मकथा भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की प्रेरक आत्मकथा है। यह पुस्तक एक युवा कैडेट से लेकर चार-सितारा जनरल बनने तक की उनकी यात्रा को साझा करती है और सैन्य नेतृत्व, अनुशासन तथा राष्ट्र सेवा पर दुर्लभ अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख की प्रभावशाली और अत्यंत व्यक्तिगत आत्मकथा है। इस पुस्तक में जनरल नरवणे पाठकों को अपने असाधारण सफर पर ले जाते हैं, अपने प्रारंभिक जीवन और प्रशिक्षण के दिनों से लेकर दुनिया की सबसे बड़ी और सम्मानित सेनाओं में से एक का नेतृत्व करने तक। सरल लेकिन रोचक शैली में लिखी गई यह पुस्तक पदों और तमगों से आगे बढ़कर सैन्य जीवन के मानवीय पक्ष को उजागर करती है। इसमें उनके करियर के अहम पड़ाव, सीमाओं पर सामना की गई चुनौतियां, महत्वपूर्ण नेतृत्व निर्णय, और वे मूल्य शामिल हैं, जिन्होंने उनके नेतृत्व को आकार दिया- अनुशासन, ईमानदारी, साहस और जिम्मेदारी।
यह पुस्तक भारतीय सेना के सर्वोच्च स्तर पर कार्यप्रणाली की पर्दे के पीछे की झलक भी देती है, जिससे यह रक्षा-रुचि रखने वालों, भावी अधिकारियों, नेतृत्व सीखने वालों और भारत के सैन्य इतिहास में रुचि रखने वाले सभी पाठकों के लिए एक आवश्यक पठन बन जाती है। फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी केवल एक व्यक्ति की उन्नति की कहानी नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सेवा, बलिदान और प्रतिबद्धता को समर्पित एक श्रद्धांजलि है।


