– जलवायु परिवर्तन पर कार्यशाला आयोजित
भिण्ड, 20 जनवरी। सामाजिक संस्था सुप्रयास तथा शेड्स ऑफ हैप्पीनेस के संयुक्त तत्वावधान में जलवायु परिवर्तन विषय पर न्यू ब्रिलिएंट कन्वेंट हाईस्कूल में कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला में विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. रामानंद शर्मा ने हमारी पृथ्वी के बदलते हुए पर्यावरण के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के कुछ प्रमुख तत्व हैं जिनमें कुछ प्राकृतिक हैं और कुछ मानव निर्मित। प्राकृतिक तत्वों में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं, वहीं मनुष्य द्वारा निर्मित भवन, पार्क, पुल, सड़कें, फैक्ट्रियां और स्मारक आदि है। मनुष्य स्वयं इस पर्यावरण की एक बहुत बड़ी कड़ी है। मनुष्य व्यक्ति के रूप में परिवार के रूप में समाज के रूप में धर्म के रूप में शिक्षा के रूप में व्यापार के रूप में राजनीति के रूप में कहीं ना कहीं पर्यावरण के साथ में तालमेल करता है अथवा बेमेल रहता है। इन सब गतिविधियों का हमारे पर्यावरण पर असर पड़ रहा है। आज पर्यावरण को नए सिरे से समझने की जरूरत है, इसलिए आज की जरूरत के हिसाब से हमें पर्यावरण की जरूरतें भी कहीं ना कहीं समझनी होगी।
चंबल नदी घाटी में मानव जीवन तथा मानव पर्यावरण बस्ती विषय पर प्रो. इकबाल अली ने कहा कि सारी दुनिया की तरह चंबल में भी वन्य क्षेत्र कम होने के कारण यहां के जीवन में बहुत परिवर्तन आया है। चंबल क्षेत्र में कभी बहुत सारे नाले और नदियां थी। जब प्राकृतिक जंगल थे तो नदियों में वर्ष भर पानी के लिए छोटे-छोटे झरने बहते थे। नदियों में पानी को धारण करने की क्षमता भी बहुत अधिक थी। कभी क्वारी नदी में भी रेत हुआ करता था। रेत के अत्यधिक खनन से अब नदियों में जल धारण करने की क्षमता नहीं रह गई और इस कारण पूरा चंबल क्षेत्र सूखा और बाढ़ से प्रभावित होने लगा है। हमें नदियों के किनारे स्थानीय वृक्षों का रोपण करना होगा तभी नदियों की जल्द धारण करने की क्षमता बढ़ेगी।
सुप्रयास के सचिव और पर्यावरणविद डॉ. मनोज जैन ने कहा कि हमें प्राकृतिक वनस्पतियों और वन्य जीवन को समझने की आवश्यकता है। मानव की खाद्यान्न की जरूरत को पूरा करने के लिए खेती जितनी आवश्यक है, उतना ही महत्व खेती की जरूरत को पूरा करने के लिए अच्छे पर्यावरण और मौसम की आवश्यकता है। अच्छा मौसम और पर्यावरण वनों के बिना संभव नहीं है। वन और कृषि एक दूसरे के सहयोगी होना चाहिए ना कि एक दूसरे के विरोधी। वर्तमान में वनों को नष्ट करके वनों पर कब्जा करके खेती करके जो प्रक्रियाएं चल रही हैं इसके कारण पर्यावरण का बहुत संतुलन हुआ है और खेती भी लाभ का सौदा नहीं रह गई है। मनुष्य जीवन में खुशहाली के लिए वनो का होना बहुत आवश्यक है। कार्यशाला में लगभग 50 प्रतिभागियों ने भाग लिया। अंत में विद्यालय के संचालक अवधेश शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया।


