– राकेश अचल
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने महात्मा गांधी के नाम पर राज्य सरकार की रोजगार गारंटी योजना ‘कर्मश्री’ की घोषणा कर महात्मा गांधी के नाम से चल रही मनरेगा जैसी योजना को खत्म करने का जो जबाब दिया वो बेमिसाल है। ममता ने साबित कर दिया है कि न ममता के भीतर का गांधी मरा है और न गांधी के भीतर का ममत्व। ममता बनर्जी ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा मनरेगा योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाया जाना बेहद शर्मनाक है। अगर वह लोग राष्ट्रपिता को सम्मान नहीं दे सकते तो हम देंगे।
ममता बनर्जी ने भारत सरकार की गांधी विरोधी हरकत का विरोध करने के लिए कांग्रेसी सांसदों की तरह जी राम जी विधेयक की प्रतियां नहीं फाड़ीं, लेकिन जिस त्वरित और तत्पर बुद्धि से महात्मा गांधी कर्मश्री योजना शुरू करने का ऐलान किया, वो काबिले तारीफ है। ममता बनर्जी मूलत: कांग्रेसी हैं और गांधीवादी विचारधारा से ही आगे बढ़ी हैं। उन्होंने 1998 में कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व से असंतुष्ट होकर कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी, लेकिन कांग्रेसी विचार और गांधी को नहीं छोड़ा। बल्कि गांधीवाद के जरिए ही बंगाल में वामपंथ का साम्राज्य उखाड़ फेंका था। ममता बनर्जी 2011 से बंगाल को अपना अभेद गढ़ बनाए हुए हैं।
दरअसल ममता के भीतर जो गांधी है वो ही गांधी करोड़ों भारतीयों के दिलो-दिमाग में भी है। इसलिए गांधी मुक्त भारत की कल्पना ही बेमानी है। हालांकि गांधी नाम के मोहताज नहीं हैं, फिर भी जिस तरह से गांधी विरोधी मुहिम भाजपा और संघ देश में चला रहा है उससे जाहिर है कि भाजपा 45 साल बाद भी देश की आत्मा को नहीं पहचान सकी। एक हकीकत ये है कि महात्मा गांधी न कांग्रेस थे और न कांग्रेस महात्मा गांधी। वे तो भारतीय आत्मा थे, जिसे कांग्रेस ने अपनी विरासत बनाया। ममता ने भी जब कांग्रेस छोड़ी तब गांधी को नहीं छोड़ा। वे गांधी को अपने साथ ले आई और जब गांधी बनाम जी राम जी का द्वंद शुरू हुआ तो वे कांग्रेस से आगे गांधी के साथ खड़ी नजर आईं। भाजपा की गांधी विरोधी मानसिकता पर प्रहार के लिए ममता बनर्जी ने जो कदम उठाया वो कांग्रेसी राज्य सरकारें भी उठा सकती थीं, लेकिन किसी कांग्रेसी सरकार को कुछ सूझा ही नहीं।
ममता बनर्जी की ही तरह भाजपा से बगावत करने वाली उमा भारती ने भी एक पार्टी बनाई थी, किंतु वे न पार्टी चला सकीं, न सरकार, क्योंकि उनके पास कोई गांधी था ही नहीं। जो थे वे उन्हें आगे बढ़ा नहीं सके। मुझे लगता है कि ममता बनर्जी को एक बार फिर केन्द्र की राजनीति में वापस लौटना चाहिए, क्योंकि देश को उन जैसे पढ़े-लिखे जुझारू नेता और नेतृत्व की जरूरत है।
ममता बनर्जी के पास इनर्जी भी है और असली डिग्रियां भी, वे हिन्दू भी हैं और ब्राह्मण भी। उन्होंने इस्लामिक इतिहास भी पढ़ा है। वे परास्नातक ही नहीं बल्कि पीएचडी उपाधि धारक भी हैं। यानि चाहे मोदीजी हों, चाहे राहुल गांधी दोनों से ज्यादा शिक्षित नेता हैं वे। उनकी स्वीकार्यता हो सकती है। कांग्रेस को इंडिया गठबंधन की गांठों को और मजबूत करते हुए ममता बनर्जी को अपने गठबंधन का मुखिया बना देना चाहिए।
बहरहाल महात्मा बनाम जी राम जी की लड़ाई ज्यादा दिन नहीं चलेगी। रामजी मन्दिर छोड़कर राजनीति करने नहीं आएंगे। देश में राजनीतिक विचार तो महात्मा गांधी की ही चलेगी। भाजपा चाहे जितना कस-बल लगा ले। भाजपा ने गांधी से लड़ना तो 11 साल पहले तभी शुरू कर दिया था जब खादी ग्रामोद्योग के केलेंडर से गांधी को बेदखल कर भाजपा के महात्मा मोदी की तस्वीर छापी थी। हमारे अग्रज कमर वहीद नकवी ने उसी समय लोकमत समाचार में लेख लिखकर देश को आगाह किया था, तब किसी ने ध्यान नहीं दिया।
भारत में गांधी की हत्या एक हकीकत है, किंतु गांधी मरकर भी नहीं मरे ये, दूसरी हकीकत है। भाजपा इसी से खीजी हुई है। वो एक बार फिर गांधी विचार की हत्या करना चाहती है। दुर्भाग्य ये है कि अबकी ये वैचारिक कत्ल हमारे सूबे के शिवराज सिंह चौहान से कराया गया है, बतौर केन्द्रीय कृषि मंत्री। अब हम भी यहीं हैं और आप भी। देखिए कि गांधी का क्या होता है? एक बार फिर गांधी को जी रही ममता बनर्जी को साधुवाद।


