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Home » संगीत के तुलसीदास तानसेन की याद

संगीत के तुलसीदास तानसेन की याद

Jagran TodayBy Jagran TodayDecember 15, 2025

– राकेश अचल

धर्म के क्षेत्र में जो प्रतिष्ठा गोस्वामी तुलसीदास को हासिल हुई, संगीत के क्षेत्र में वैसी ही प्रतिष्ठा तानसेन के खाते में दर्ज है। बिना किसी विरासत के आज 21वीं सदी में तुलसीदास भी जीवित हैं और तानसेन भी। ग्वालियर में तानसेन को हर साल याद करने की शताब्दी पुरानी परंपरा का नाम है तानसेन समारोह। ये समारोह तानसेन की समाधि पर होता है।
मैं ग्वालियर में 1972 में आया था। इससे पहले मैं तानसेन से अनभिज्ञ था, लेकिन आज 53 साल हो गए तानसेन से जो रिश्ता जुड़ा वो आज भी बरकरार है। मै संगीतज्ञ नहीं हूं, लेकिन संगीत से मेरा गहरा लगाव तानसेन की वजह से ही हुआ। मुमकिन है कि यदि मैं ग्वालियर न आया होता तो संगीत मेरी कमजोरी न बनता। तानसेन का मकबरा कहें या समाधि और उनका गांव बेहट मेरे लिए तीर्थ जैसा है। मेरे जैसे असंख्य लोगों के लिए ये दोनों ठिकाने तीर्थ जैसे हैं। मैंने बीती आधी सदी में इन दोनों तीर्थों पर 20वीं और 21वीं सदी के शीर्षस्थ संगीतज्ञों को शीश नवाते देखा हो, फिर चाहे शहनाई का पर्याय उस्ताद विस्मिल्लाह खान साहब हों या सितार के पर्याय पं. रविशंकर। लंबी फेहरिस्त है ऐसे संगीत मनीषियों की।
मेरी स्मृतियों में वो तानसेन समारोह बसा है जिसमें न रोशनी की चकाचौंध थी, न कोई भव्य दिव्य मंच। न नेता थे ब और न कोई तामझाम। किंतु तब संगीत का सर्वश्रेष्ठ इस समारोह में रसास्वादन के लिए मिलता था। तब संगीतज्ञ और श्रोताओं के बीच सीधा रिश्ता था जो अब बदल चुका है। बदलाव प्रकृति का नियम है, लेकिन प्राकृतिक बदलाव और कृत्रिम बदलाव में फर्क है। इसी फर्क ने तानसेन समारोह का स्वरूप बदल दिया है। अब समारोह के नाम पर जो प्रयोग हो रहे हैं वे असहज करते हैं। यूं भी संगीत की राजधानी अब संगीतज्ञों की कमी महसूस करने लगी है। ग्वालियर का प्रतिष्ठित संगीत घराना एक तरह से अंतिम सांसे ले रहा है, क्योंकि इन घरानों के वारिसान मान-प्रतिष्ठा की तलाश करते करते ग्वालियर से दूर हो गए।
हकीकत है कि मान-प्रतिष्ठा पाने के लिए गृहत्यागी बनना पड़ता है। तानसेन को भी संगीत सम्राट बनने के लिए ग्वालियर का मोह त्यागना पड़ा था। तानसेन ग्वालियर से पहले रीवा और बाद में दिल्ली के अकबर दरबार में पहुंचे और फिर वहीं के होकर रह गए। लौटे तो मिट्टी बनकर। तानसेन को बादशाह अकबर ने अपना नवरत्न बना लिया था। उन्हें बाद में धर्म परिवर्तन भी शायद करना पड़ा, किंतु उनका संगीत सदैव भारतीय शास्त्रीय बना रहा। तानसेन को जानने के लिए उनकी रचनाएं ही हैं। वे अपने समकालीन गोस्वमी तुलसीदास की तरह कोई रामचरित मानस जैसा संगीत ग्रंथ नहीं लिख पाए, किंतु वे जो भी विरासत छोड़ गए, उसे संगीत की दुनिया में रामचरित मानस की तरह सम्मान हांसिल है।
मुझे याद हैं वे दिन जब ग्वालियर के लोग तानसेन समारोह में शामिल होने के लिए पैदल, तांगे से और रोडवेज की सिटीबस से हजीरा स्थिति तानसेन की समाधि पर जमा होते थे। तब न शहर में समारोह का कोई होर्डिंग लगता था, न टीवी था, न मोबाइल, लेकिन ग्वालियर वालों को समारोह की तिथियां पूर्णिमा और अमावस की तरह याद रहती थीं। उन दिनों तानसेन समारोह राजाश्रय से निकलकर मप्र सरकार के जनसंपर्क विभाग के हाथों में आ चुका था। संगीत प्रेमी जनसंपर्क उप संचालक भाऊ साहब खिड़बड़कर समारोह शुरू होने से हफ्ते भर पहले ग्वालियर में डेरा डाल लेते थे। तानसेन की समाधि के ठीक सामने साधारण सा मंच बनता था, सामने दर्शकों के लिए टेंट ताना जाता था। सर्दी से बचाव के लिए पुआल बिछाकर उसके ऊपर गद्दे और फर्श बिछाए जाते थे। जो अक्सर ओस में गीले हो जाया करते थे, लेकिन मजाल है कि कोई श्रोता मैदान छोड़कर जाए।
तानसेन समारोह में उस समय संगीतज्ञ सर्वोपरि थे। प्रस्तुति की कोई समय सीमा न थी। मजाल है कि आयोजक संगीतज्ञ से समय का हवाला देकर मंच खाली करने के लिए कह दें। तब सुहब की सभाएं अपरान्ह चार बजे तक और शाम की सभाएं देर रात दो-तीन बजे तक चलती थीं। श्रोता घर जाने के बजाय टेंट में ही फर्श-गद्दे ओढ़कर सो जाते थे। मुझे याद है कि उस समय अधिकांश अतिथि संगीतज्ञ स्थानीय संगीतज्ञों के मेहमान होते थे। होटल में तो कोई बिरला ही ठहरता हो। पद्मभूषण पं. कृष्ण राव, शंकर राव पंडित अपनी मंडली के साथ अपने तांगे में बैठ कर कंपू से आया करते थे। मेरे पड़ौसी थे, इसलिए कभी कभी मैं भी उनके तांगे में लटक लेता था। उस्ताद अमजद अली, पूछवाले, तैलंग, उमड़ेकर और न जाने कितने संगीत साधक परिवार अंडी-बच्चों के साथ समारोह की हर सभा में मौजूद रहते थे। बाहर से आने वाले श्रोता धर्मशालाओं में डेरा डाल लेते थे। सागर के बंडा से एक रामशरण गौतम तो अपनी पान टुकनिया लेकर पूरे हफ्ते यहां हाजरी देने आते थे।
अब सब बदल गया है। समारोह तानसेन के नाम पर है, लेकिन तानें बिखर रही हैं। समारोह भव्य, दिव्य हो गया है किंतु शुचिता नदारद है। अब समारोह को विस्तार देने के नाम पर हास्यास्पद प्रयोग हो रहे हैं। बजट हजारों से बढ़कर लाखों में पहुंच चुका है। एक की जगह तीन पुरस्कार दिए जा रहे हैं। मैं आज भी तानसेन की समाधि पर माथा टेकने जाता हूं। आज भी जाऊंगा, पुराने दिनों की स्मृतियों की छड़ी लेकर। आप भी आइये।

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