– चले सुदामा धीरे धीरे टीकम टीक दुपहरिया में चावल बांधे पुटरिया में
भिण्ड, 24 मई। नगर मिहोना से तीन किमी दूरी पर स्थित इमलाहा गांव में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के अंतिम दिन कथा वक्ता रवी महाराज ने कहा कि संसार में परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट पहुंचाने के बराबर कोई पाप नहीं है। इस कारण से हमें जीवन में ज्यादा से ज्यादा नि:स्वार्थ होकर दूसरों की भलाई एवं सेवा करना चाहिए।
उन्होंने कह कि हम सभी को अपने जीवन में ऐसे कार्य करना चाहिए जिससे दूसरे व्यक्ति का हित हो, रामचरितमानस में बाबा गोस्वामी दास जी महाराज ने कहा है कि परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधिमाई।। अर्थात हमारे द्वारा कोई ऐसा काम नहीं किया जाए जिससे दूसरे व्यक्ति को पीड़ा पहुंचे। हम अपने जीवन में परहित करें और सत्य बोलें, सत्य बोलना भी दूसरा बहुत बड़ा धर्म है और असत्य बोलना बहुत बड़ा पाप है। तुलसीदास जी ने कहा है कि धर्म न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुराण बखाना।। कहावत में भी कहा गया है कि पुण्य की जड़ पाताल और पाप की जड़ अस्पताल में होती है।
कथा के दौरान अक्रूर प्रसंग की कथा कहते हुए कंस वध की कथा सुनाई और कंस की पत्नी अस्ति प्राप्ति अपने पिता जरासंध के यहां गई तो जरासंध ने 17 बार मथुरा मण्डल पर चढ़ाई की 18वी बार दो बिपत्ती काल यवन और जरासंध के रुप में आई। काल यवन को मुचकुंद के द्वार भस्म करा के द्वारिका नगरी का निर्माण कराया। जरासिंध का बध भीम द्वारा मल्ल युद्ध में कराया एवं जरासंध के कारागार से बीस हजार राजाओं को मुक्त कराया एवं राजस्वी यज्ञ के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का बध कर दिया व सुदामा चरित्र की कथा सुनाई। कथा में यजमान मधु प्रवीण सिंह राजावत एवं भारी संख्या में श्रोता मौजूद रहे। अंत में श्रीमद् भागवत कथा की आरती के बाद प्रसादी वितरण की गई।


