-ग्राम सगरा स्थित बाबा पाण्डरी धाम परिसर में देवी भागवत कथा में हो रहे प्रवचन
भिण्ड, 10 मई। जिले के ग्राम सगरा स्थित बाबा पाण्डरी धाम परिसर में चल 21 कुण्डीय होमात्मक सहसचण्डी महायज्ञ के दौरान चल रही देवी भागवत कथा के सप्तम दिवस स्वामी त्रिअम्बकेश्वर ब्रह्मानंद सरस्वती महाराज ने ज्ञानवर्धक, भक्तिवर्धक अनेकों प्रसंगों पर प्रवचन किए।
उन्होंने नारदजी द्वारा दक्ष के पुत्रों को बारम्बार भिक्षु बना देने पर एक स्थान पर ढाई घड़ी से अधिक ना रुकने का श्राप लगना, महात्मा च्यवन की कथा, शिव-पार्वती के पुत्रों कार्तिकेयन एवं गजानन में प्रथम पूज्य देव अर्थात गणेश बनने की प्रतियोगिता होना, कार्तिकेयन का ब्रह्माण्ड परिक्रमा करना और गजानन द्वारा केवल माता पिता की परिक्रमा करके शास्त्रीय प्रामाणिकता से गणेशपद प्राप्त करने की कथा सुनाकर मनुष्य के जीवन में माता-पिता के स्थान की उच्चता को परिभाषित किया अर्थात जगत में माता पिता ही सर्वोच्च हैं।
इसी क्रम में दण्डीस्वामी महाराज ने राजा त्रिशंकु के माध्यम से वेदविहित वशिष्ठजी की विजय एवं तप बल के दर्प में डूबे ज्ञानी महर्षि विश्वामित्र ने त्रिशंकु के शशरीर स्वर्ग में पहुंचाने की अवैदिक क्रिया से अपने द्वारा अर्जित तपस्या से मान-सम्मान के क्षय का सामना किया। व्यासजी ने त्रिशंकु के पुत्र राजा हरिश्चन्द्र का चरित्र बहुत ही सुन्दर ढंग से समझाया। श्रोताओं ने अनेकों बार करतल ध्वनि करके व्यासजी के वचनों का अभिनंदन किया।
मानस पुरुष राजीव गुरूजी ने कथा की समीक्षा करते हुए बताया कि समाज के अधिकतर व्यक्ति कर्म और भाग्य के मध्य आपस में वाद-विवाद करते दिखाई देते हैं, दोनों ही पक्ष अपनी बात के पक्ष में श्रीराम चरित मानस की चौपाइयों का प्रमाण देते हैं, जो लोग भाग्य को बड़ा बताते हैं वह कहते हैं कि तुलसीदास जी ने लिखा है..होइहि सोइ जो राम रचि राखा, दूसरा पक्ष जो अपने कर्म को पुरुषार्थ को बड़ा बताते हैं, कहते हैं तुलसी ने ये भी तो लिखा है-कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
मानस-पुरुष बताते हैं कि प्रथम दृष्टया दोनों ही सत्य कहते प्रतीत होते हैं किन्तु सत्य नहीं है। सत्य तो यह है कि मनुष्य के द्वारा किए गये कर्म, पुरुषार्थ में जब संत या भगवन्त की इच्छा आशीर्वाद मिल जाता है तब जीव का कल्याण निश्चित हो जाता है। क्योंकि यदि केवल कर्म से ही लाभ मिलता हो तो सबसे अधिक श्रम करने वाले श्रमिक को अधिक लाभ मिलना चाहिए और यदि केवल भाग्य से सब कुछ मिलना हो तो फिर कोई कर्म क्यों करेगा। अत: क्रिया और कृपा से ही मनुष्य परम लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।


