भिण्ड, 28 मई। संग्राम में विजय प्राप्त कर लेना सरल है, हजारों-लाखों को परास्त करना सरल है, पोथियां लिखना, तीर्थ बनाना सरल है, हजारों भक्त बनाना सरल है, परन्तु निर्दोश ब्रह्मचर्य पालन करना कठिन है। यह उद्गार पट्टाचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने ग्राम रिदौली में आयोजित मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में तप कल्याणक के पावन अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि यदि जीवन को आदर्श बनाना है तो अपने जीवन में विनय-गुण नहीं छोड़ना। वृद्ध माता-पिता की सेवा करना, संतान का पालन करना एवं धर्म-संकृति के लिए यथा-योग्य दान करना चाहिए। दिगंबर जैन मुनि अपनी तपस्या में बहुत कठोर होते हैं। हमेशा नग्न दिगंबर (निर्वस्त्र) रहते हैं। एक बार भोजन ग्रहण करते हैं। हाथों से केशलोंच करते हैं, पग-बिहार करते हैं। करपात्री होते हैं। उन्होंने कहा कि मां, महात्मा और परमात्मा तीनों की सीख सुखद होती है। सुखद जीवन जीना है तो नीति-रीति का ज्ञान होना चाहिए। साता का उदय है, पुण्य प्रबल है तो जंगल में भी मंगल हो जाता है। पुण्यात्मा की देव भी सेवा करते हैं। पुण्य के उदय में शत्रु भी मित्र बन जाता है। अग्नि नीर बन जाती है।
आचार्य ने कहा कि पानी की बूंद-बूंद की रक्षा करो। स्वाति नक्षत्र की बूंद यदि सीप में गिर जाए तो मोती बन जाती है। मोती बनना है तो समय की कीमत समझो। समय पर किया कार्य ही सफलता प्रदान करता है। जो समय की कीमत करता है, समय उसकी कीमत करता है। रिदौली में आयोजित भव्य पंचकल्याणक महोत्सव के अवसर पर तप कल्याणक के दिन भिण्ड सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से महिला-पुरुषों व युवक-युवतियों नेे शिरकत की और आचार्य के अमृतमयी प्रवचनों का लाभ लिया तथा उनकी आहारचर्या करवाई।
Friday, May 29
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