– राकेश अचल
निरीह गाय के नाम पर देश की जनता से वोट कबाड़ने वाली भाजपा को अब गाय के नाम पर हाय-हाय बंद कर देना चाहिए, क्योंकि बंगाल में नवगठित भाजपा सरकार ने गोवध को सख्ती से रोकने के बजाय 76 साल पुराने उस कानून को लागू करने का फैसला किया है जिसके तहत 14 साल से अधिक उम्र की गाय का सशर्त कत्ल किया जा सकता है।
मैं जब बच्चा था तब देश में भाजपा का नाम जनसंघ था। तब संघी दीपक और तेल की बात करते थे, गाय की नहीं। गाय की बात कांग्रेसी करते थे। उनका चुनावी नारा होता था- गाय हमारी माता है, दीपक से क्या नाता है? उस समय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हाथ का पंजा नहीं गाय-बछड़ा था। कांग्रेस के पास पहले दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिन्ह था। शायद 1952 से 1969 तक रहा। 1971 में कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस को गाय-बछड़ा मिला था। 1977 से अब तक कांग्रेस हाथ के पंजे के साथ राजनीति में है।
गाय को राजमाता कहने वाली भाजपा या जनसंघ का गाय से कभी कोई रिश्ता रहा ही नहीं है। जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक था जो 1977 में हल जोतता किसान हुआ और 1980 में जब भाजपा बनी तो भाजपा ने कमल के फूल को अपना चुनाव चिन्ह बना लिया। गाय-बछड़ा, बैल जोड़ी या हलधर भाजपा को कभी जंचे ही नहीं। भाजपा ने गाय से रिश्ता जोड़ा 2014 के चुनाव के बाद। गाय को भी जोड़ना भाजपा की मजबूरी थी, क्योंकि उसे हिंदुत्व का राग अलापना था। किंतु यही गाय भाजपा के गले की हड्डी बन गई है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरा नंद ने भाजपा की यूपी सरकार के सामने गाय को राजमाता घोषित करने और पूर्ण गौवध की मांग को लेकर न सिर्फ आंदोलन शुरू कर दिया, बल्कि ओएलएक्स जैसा एप बनाकर गाय खरीदने की मुहिम भी चला दी। दूसरी तरफ गाय के मांस को लेकर हमेशा भाजपा के निशाने पर रहने वाले देश के खासतौर पर बंगाल के मुस्लिम समाज ने ईद पर कुर्बानी के लिए गाय खरीदने से इंकार किया तो बंगाल में गाय बेचकर पेट पालने वाले हिंदू व्यापारी सड़क पर आ गए। भाजपा अब करे तो क्या करे? गाय बचाती है तो बंगाल और यूपी की सत्ता जाती है और यदि सत्ता बचाती है तो गाय मारी जाती है।
बंगाल जीतने के लिए ऐढ़ी-चोटी का जोर लगाने वाली भाजपा ने आखिर में सत्ता को चुना। गाय को कत्ल होने के लिए छोड़ दिया। ये तुष्टिकरण था बंगाल के हिन्दू वोटरों का। ताजा खबर है कि बंगाल की सरकार ने 1950 में बने उस कानून को फिर लागू कर दिया है जिसके तहत किसी गाय, बैल, भैंस आदि को तभी काटा जा सकता है, जब वह 14 वर्ष से अधिक उम्र का हो और काम या प्रजनन के योग्य न रहे या वह स्थाई रूप से घायल, विकलांग या असाध्य बीमारी से ग्रस्त हो। इसके लिए नगर पालिका/ पंचायत प्रमुख और सरकारी पशु चिकित्सक का वध योग्य पशु का प्रमाणपत्र जरूरी होता है।
अब बंगाल में भाजपा की सत्ता भी बच गई, हिन्दू कसाई भी खुश, उनकी रोजी रोटी भी बच गई। मुस्लिम भी खुश कि वे भगवा ब्रिगेड का निशाना बनने से बच गए। नहीं बची तो बेचारी गाय जो भाजपा को वोट दिलाने की मशीन थी। बंगाल सरकार के इस फैसले से भाजपा के चेहरे पर पड़ा हिंदुत्व का नकाब हट गया है। अब बंगाल के ही नहीं असम और जहां भी भाजपा की सरकार है वहां के लोग शौक से गौमांस खा सकते हैं। गौमांस का कारोबार भी कर सकते हैं।
आपको बता दें कि भाजपा जिस भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए हर लक्ष्मण रेखा लांघ रही है उसी भारत का मांस निर्यात 2024 में लगभग 1.24 मिलियन मीट्रिक टन रहा। कहने को ये भैंस का मांस होता है, लेकिन इसमें अघोषित रूप से गौमांस भी निर्यात किया जाता है। इसकी कुल कीमत करीब 3.9 अरब डॉलर बताई गई। इसमें लगभग 4 प्रतिशत वृद्धि हर साल हो जाती है। आपको बता दूं कि भारत के भैंसों-गायों के मांस के प्रमुख खरीदार देशों में वियतनाम, मलेशिया, मिस्त्र, यूएई और इराक शामिल हैं। इस कारोबार की और पर्तें मैं नहीं खोलूंगा, क्योंकि इससे गायों की तरह मैं भी संकट में पड़ सकता हूं। सनद रहे कि मैं हिंदू हूं और मेरे घर में गौग्रास सदियों से निकाल कर गाय को ही खिलाया जाता है।


